शुक्रवार, 15 मई 2020

बकानी की आर्थिक-सामाजिक-सांस्कृतिक धरोहर


बकानी की आर्थिक-सामाजिक-सांस्कृतिक धरोहर
                             
- एस एन घाटिया एवं चंदन घाटिया 

[आचार्य चाणक्य ने सूत्र प्रदीप में कहा है “अर्थार्थ प्रवर्तते लोकः” अर्थात अर्थ के लिए ही लोक में प्रवृत्ति होती है और “वृत्ति मूलं अर्थ लाभः” वृत्ति (व्यवसाय/अर्थोपार्जन की क्रियाएं) आर्थिक समृद्धि का मूल है| बकानी क्षेत्र के आर्थिक, व्यापारिक एवं वाणिज्यिक परिप्रेक्ष्यों को विभिन्न दृष्टिकोणों से रूपायित करता है, यह अमूल्य आलेख श्री सत्यनारायण घाटिया द्वारा आलेखित है जो उनके विशिष्ट ज्ञान क्षेत्र के गहन प्रेक्षण एवं लेखन कौशल की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि व निष्पत्ति है| स्वज्ञान, स्वाध्याय, साक्षात्कार एवं वार्ताओं पर आश्रित तथ्यात्मक संकलन व निरूपण उनका व्यक्तिगत संज्ञान है और एतदर्थ प्रामाणिकता भी स्वयं की ही है| आलेख का कलेवर वृहत होते हुए भी सारगर्भित है तथा एतद संदर्भित चिंतन के लिए नवीन आयामों को चीन्हने की प्रेरणा देता है| श्री घाटिया के परिश्रम साध्य पुरुषार्थ हेतु आभार|     _सम्पादक त्रय]    

बकानी की अर्थव्यवस्था के बारे में जब भी सोचता हूं तो मेरी बाल्यकालीन स्मृतियों की अतल गहराइयों में से  दीपावली पूजन का एक सजीव दृश्य मानस पटल पर उभर कर आता है| दुकान की गादी पर श्वेत धवल चद्दर बिछी हुई है। वहां पूजा के पाटे पर कोरा लाल-सफेद कपड़ा बिछा कर लक्ष्मी-पूजन के पारंपरिक पाने के सामने नए बही-खाते रखे हुए हैं; पीतल की दो बडी फीलसोत (दीपस्तंभ) पाटिए के दोनो और प्रज्वलित हैं; दो ताजा सांठे (गन्ने) दीवार के दोनो कोनों में खड़े किए हुए हैं; छत के कड़ों में नई ज्वार की फोंकड़ियां लगी हुई हैं और पूजन सामग्री को थाली में व्यवस्थित कर मेरे पिताजी श्री रामनारायणजी घाटिया सफेद खादी के नए धोती-कुर्ते व लाल रंग की इन्दौरी पगड़ी पहने हुए पंडित श्री बालचंदजी व्यास के आने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। मैं भी नए कपड़े पहने हुए व्यग्रता से पंडितजी की राह देख रहा हूं क्योंकि पूजन संपन्न होने के बाद ही हमे  फुलझड़ियां-पटाखे चलाने को मिलेंगे। दो-तीन बार बाज़ार के दरवाजे पर जा कर देख भी आया हूं कि अभी पंडितजी किस की दुकान पर पूजा करा रहे हैं।

दीपावली के त्योहार की तैयारियों में दशहरे के बाद से ही घर-परिवार के सभी छोटे-बड़े सदस्य व्यस्त हो जाते थे। सब अपनी सामर्थ्य के अनुसार अपने घर-दुकान की सफाई-लिपाई-पुताई में लग जाते थे। धनतेरस के एक दिन पहले से गृहणियां मीठे व नमकीन गुने-शक्करपारे, खुरमे, बर्फी, लड्डू और बेसन चक्की आदि मिठाइयां बनाने में व्यस्त हो जाती थी, क्योंकि दीपावली के दूसरे दिन से ही गांव में सभी रिश्तेदारों व परिचितों के यहां मिठाइयां भेजने का सिलसिला चालू हो जाता था। सबके मन में यह होड़-सी रहती थी कि मेरे घर-दुकान का रंग-रोगन सबसे सुंदर हो, मेरे यहां के दियों की रोशनी सबसे अच्छी व सबसे ज्यादा समय तक चलने वाली हो और मेरे यहां की मिठाई सबसे स्वादिष्ट हो। स्वच्छता के प्रति इस जन-जागरूकता की पुष्टि दीपावली के पूर्व बालकों द्वारा सन्ध्याकाल में घर-घर जा गाए जाने वाले “हरनी” लोकगीत की इस पंक्ति “लीप्यो पोत्यो आंगणो, तर्र बिच्छू जाय” में भी प्रतिबिंबित होती है। इस स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के मूल में यह भावना रहती थी कि स्वच्छता, उज्ज्वल प्रकाश और स्वादिष्ट भोजन से घर में सुख-समृद्धि (लक्ष्मीजी) बनी रहती है। सभी मकानों-दुकानों के छज्जों पर मिट्टी के छोटे दियों (दीपक) की पंक्तिबद्ध लौ गली-मोहल्लों में अमावस की अंधेरी रात को भी  प्रकाशमान कर देती थी। अगले दिन बाज़ार के सभी दुकानदार दीपावली पूजन के प्रसाद के रूप में खांखरे के पत्तों के दोनों में गुड़ भर कर एक-दूसरे के यहां भेजते थे।                    

सन 1960 तक बकानी के बाज़ार में दीपावली पर्व का यह सामान्य दृश्य हुआ करता था। जन्म से किशोरावस्था तक बकानी में इन त्योहारों की स्वस्थ परंपराओं से संस्कारित हो मैं जब अध्ययन और नौकरी के सिलसिले में बाहर निकला तो मुझे देश-विदेश के कई छोटे-बड़े तथा प्रसिद्ध शहरों-कस्बों मे रहने का अवसर मिला। किंतु बकानी के दीपावली पर्व जैसी छटा कहीं देखने को नहीं मिली। यहां यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि दीपावली के त्योहार की इन सामान्य-सी बातों का अर्थव्यवस्था से क्या संबंध है? आर्थिक एवं वित्तीय क्षेत्र में अध्ययन व अनुभव की लंबी शृंखला के पश्चात अब मेरी मान्यता दृढ़ होती जा रही है कि किसी भी स्थान पर मनाए जाने वाले त्योहारों का स्तर वहां की अर्थव्यवस्था की सुदृढ़ता और सामाजिक-सांस्कृतिक संपन्नता का द्योतक होता है। इस संदर्भ में दीपावली पर प्रचलित सभी परंपराओं का प्रतीकात्मक अर्थ भी अब सुस्पष्ट  होता जा रहा है। उदाहरण के लिए, दीपावली पूजा के पाने को ही लें। जीवन में अधिक-से-अधिक धन कमाना हर सांसारिक व्यक्ति का लक्ष्य होता है। अतः दीपावली के त्योहार की परंपरा विकसित हुई, जिसमें धन-समृद्धि की देवी लक्ष्मीजी की पूजा-अर्चना की जाती है। लक्ष्मीजी के साथ गणेशजी को भी स्थापित किया गया है ताकि किसी भी कार्य की सफलता में विघ्न-बाधायें नहीं आएं।  दीपावली पूजन के पाने में गणेशजी को स्थापित करने का एक प्रतीकात्मक कारण यह भी है कि रिद्धि व सिद्धि गणेशजी की पत्नियां हैं और सिद्धि से शुभ एवं रिद्धि से लाभ उनके पुत्र हैं। ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है जहां उल्टे-सीधे तरीके से कमाए गए धन के देर-सबेर दुष्परिणाम देखे जाते हैं। भारतीय संस्कृति में धनोर्पाजन की प्रक्रिया में साधनों की शुद्धता को महत्व दिया गया है, जीवन में हमें धन-लाभ हो पर वह लाभ हमारे लिए शुभ भी हो। अतः रिद्धि-सिद्धि और शुभ-लाभ के स्वामी गणेशजी का पूजन भी लक्ष्मीजी के साथ किया जाता है। पूजा के पाने में विद्या की देवी सरस्वतीजी को भी स्थापित किया गया है। जनमानस में यह धारणा प्रचलित है कि लक्ष्मीजी और सरस्वतीजी अपनी स्वभावगत विशेषताओं के कारण एक साथ नहीं रह सकती हैं। लेकिन दीपावली-पूजन के पाने में हम इन दोनों देवियों को लोकमंगल हेतु साथ पाते हैं। दीपावली ही एक ऐसा पर्व है जब लक्ष्मीजी, सरस्वतीजी और गणेशजी की संयुक्त पूजा-अर्चना के माध्यम से हम प्रार्थना करते हैं कि हमारे ऊपर इन तीनों का आशीर्वाद बना रहे, हम विद्या से सुसंस्कृत हो जीवन में निरंतर शुभ लाभ प्राप्त करते हुए सुख-समृद्धि के पथ पर अग्रसर होते रहें। गहराई में जाने पर, हम पाते हैं कि दीपावली-पूजा के इस पाने में हमने सृष्टि के तीनों नियंताओं (ब्रह्मा-विष्णु-महेश) के परिवार के सदस्यों को प्रतिनिधित्व दे कर इस ज्योति-पर्व को सामाजिक स्तर पर पारिवारिक उत्सव का रूप दे दिया है।          

इस पौराणिक पक्ष से हट कर, यदि शुद्ध अर्थशास्त्रीय सिद्धांतों की दृष्टि से देखें तो किसी भी स्थान की अर्थव्यवस्था का स्तर वहां के उत्पादन पर निर्भर करता है और उत्पादन के मूल साधन हैं –
1. भूमि
2. श्रम
3. पूंजी
4. उद्यमी 

भूमि के अंतर्गत सभी प्राकृतिक संसाधन जैसे कृषि, गैर-कृषि भूमि, नदी-नाले, वन व पहाड़ आदि हैं। बकानी की अर्थव्यवस्था के मूल आधार को समझने के लिए हमें यहां की भौगोलिक स्थिति, जलवायु और भू-संरचना को ध्यान में रखना होगा। बकानी मालवा के पठार पर स्थित है। मुकुन्दरा पहाड़ी की दक्षिणी भुजा (अधिकतम ऊंचाई 1406 फीट) बकानी क्षेत्र में उत्तर-पश्चिम से दक्षिण-पूर्व दिशाओं में फैली हुई है। यहां की प्रमुख नदी कालीसिंध है जिसमे कई छोटी नदियां-नाले इसके पूर्वी किनारे पर मिलते हैं। बकानी क्षेत्र में वर्षा का वार्षिक औसत 37 इंच है जो जिले व राज्य के औसत से अधिक है। किंतु वर्षा के जल को संचित करने हेतु कोई बांध व नहरें न होने के कारण सिंचाई व पेय जल के लिए आरंभ से ही कुओं पर निर्भरता अधिक रही है। बकानी ग्राम में पीने के पानी के लिए बोहरे के कुए और मोमिनों के कुए का महत्व सर्वविदित है। गर्मियों में पीने के पानी की किल्लत के बावजूद, बकानी ग्राम सौभाग्यशाली है कि यहां का धरातलीय जल विकार-रहित है और 10 मीटर से कम गहराई पर ही जलस्तर प्राप्त हो जाता है। कालीसिंध नदी के पूर्वी किनारे का क्षेत्र मैदानी है जहां कुछ भूरापन लिए हुए काली दोमट मिट्टी पाई जाती है, जो सभी प्रकार के खाद्यानों, सब्ज़ियों और कपास, अफीम, धनिया, तिलहन व गन्ने जैसी नकद फसलों (Cash Crops) के लिए अत्यंत उपयुक्त है। बकाइन के पेड़ अधिक होने के कारण यह ग्राम बकानी नाम से जाना जाने लगा। ज्ञानमंडल वाराणसी के बृहत हिंदी कोश के अनुसार “बकाइन” अथवा “बकायन” “नीम की जाति का एक पेड़ होता है जिसके फल, फूल, पत्तियां आदि दवा के काम में आते हैं, महानिंब।“

अर्थव्यवस्था का दूसरा प्रमुख घटक श्रम शक्ति है। यह भी एक प्रकार से प्राकृतिक संसाधन ही है क्योंकि कार्यशील जनसंख्या की उपलब्धता स्थान-विशेष की भौगोलिक स्थितियों पर निर्भर  होती है। जहां स्थानीय श्रम शक्ति की कमी होती है, वहां श्रमिक दूसरे स्थानों से आते हैं। बकानी में आवश्यकताओं के अनुरूप पर्याप्त श्रम शक्ति उपलब्ध है। 

शेष दो साधन पूंजी उद्यमी (Entrepreneur) मानव-निर्मित साधन हैं। उत्पादन के इन साधनों में उद्यमी सर्वाधिक महत्वपूर्ण होता है क्योंकि वह उत्पादन के सभी साधनों का संयोजन कर उन्हें धनोर्पाजन योग्य बनाता है। कुछ-न-कुछ प्राकृतिक संसाधन तो सभी स्थानों पर होते हैं, किंतु जहां कुशल उद्यमी होते हैं वे उन संसाधनों का अधिकतम उपयोग कर स्थानीय अर्थव्यवस्था को गति प्रदान करते हैं, जिससे सुदृढ़ आर्थिक-सामाजिक-सांस्कृतिक ताने-बाने का निर्माण होता है। बकानी ग्राम के साथ भी कुछ ऐसा ही सुखद संयोग रहा कि भौगोलिक दृष्टि से यहां कृषि व संबद्ध कार्यों के लिए प्राकृतिक संसाधन एवं श्रम भरपूर मात्रा में उपलब्ध थे। आवश्यकता थी कुशल उद्यमियों की जो इन साधनों का व्यावसायिक दोहन कर अर्थव्यवस्था को गति प्रदान कर सकें। और, बकानी में ये उद्यमी आए मरुभूमि मारवाड़ से जो अपनी उद्यमिता के लिए प्रसिद्ध है!   

आरंभ में बकानी छोटा सा गांव था और कृषि योग्य परिवेश के कारण यहां मूलतः कृषक परिवारों की ही बस्ती थी। कृषकों में भी, उस समय बकानी में काछी (कुशवाह) समाज का बाहुल्य था। इसी प्रकार समीपस्थ स्थित  थोबड़िया गांव में कुल्मियों (पाटीदारों) और देवर गांव में गूजरों की अधिकता थी। किसी एक समुदाय विशेष के बाहुल्य की प्रवृत्ति लगभग सभी गांवों में देखी जा सकती है। बकानी में उस समय अधिकांश आबादी गांव के दक्षिण-पूर्वी छोर पर वर्तमान सारोतिया के आसपास बसी हुई थी। बकानी की आर्थिक व सामाजिक व्यवस्था का वर्तमान स्वरूप लगभग 300 वर्ष पूर्व विकसित होना आरंभ हुआ जब मारवाड़ क्षेत्र में स्थित नागौर जिले के मेड़ता नगर से माहेश्वरी वैश्य समाज के कुछ परिवार काफी लंबी यात्रा व कई स्थानों पर रहने के बाद बकानी के शांत वातावरण और कृषि बाहुल्य क्षेत्र को अपने व्यापार के अनुकूल पा कर यहां स्थायी रूप से बस गए। इतिहास के उस काल-खंड में, सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण तत्कालीन नागौर राज्य पर अधिकार करने हेतु चौहान, राठौड़, सीसोदिया, मंगोलों, तुर्कों व मुगल वंश के शासकों के बीच आए दिन होने वाले सत्ता-संघर्ष के कारण मार-काट, लूट-पाट होती रहती थी। इसके कारण अशांत व असुरक्षित वातावरण में सामान्य जन-जीवन अस्त-व्यस्त हो गया था। विशेष रूप से, व्यापारी वर्ग के लिए व्यापार-व्यवसाय करना कठिन हो गया था। जनश्रुतियों के अनुसार, लगभग 500 वर्ष पूर्व वहां के तत्कालीन शासकों से विवाद के कारण इन माहेश्वरी परिवारों ने मेड़ता छोड़ कर व्यापारिक दृष्टि से सुरक्षित स्थान की खोज में अपनी कुलदेवी फलौदी माता की शोभायात्रा के साथ मालवा की और प्रस्थान किया। मेड़ता के होने के कारण यह समुदाय बाद में मेड़तवाल वैश्य कहलाया। कालांतर में, इन मेड़तवालों का अपने मूल माहेश्वरी समुदाय से कोई संबंध नहीं रहा और अब ये लोग वैश्य समाज के एक स्वतंत्र घटक के रूप में जाने जाते हैं। संवत 1601 में पुष्कर से निकल  विभिन्न मार्गों द्वारा भ्रमण करते हुए भानपुरा, रावतभाटा, मोहना, गढ़गागरोन, झालावाड़, सुकेत होते हुए संवत 1796 (ईस्वी सन 1740) में खैराबाद में कुलदेवी फलौदी माता को देवरा (स्थानक) में स्थापित किया। कुछ दशकों बाद, वर्तमान फलौदी माता मंदिर का निर्माण आरंभ किया जो वहां लगे  शिलालेख के अनुसार संवत 1848 में पूर्ण हुआ।इस प्रकार, संवत 1601 में पुष्कर से प्रस्थान के बाद और संवत 1796 में फलौदी माताजी के खैराबाद में स्थापित होने के बीच की अवधि में मेड़तवाल समाज के परिवार शनैः-शनैः अपनी सुविधा और परिस्थितियों के अनुसार हाड़ौती व मालवा के विभिन्न स्थानों में बसते गए। इसी क्रम में मेड़तवाल समाज के कुछ परिवार बकानी ग्राम में आ कर बस गए।  

इसी संक्रमण काल में अन्य जातियों के परिवार भी नागौर जिले से निकल गए थे। जैसे कि, नागौर जिले के ही बाप गांव से कुछ गुर्जरगौड़ ब्राहमण परिवार भी आए थे। इसी प्रकार लाडपुरा गांव (मेड़ता से 45 कि.मी.), तहसील डेगाना जिला नागौर से भारद्वाज गोत्रीय गूर्जरगौड़ ब्राहमण श्री कुशालचंदजी के परिवारजन भी मारवाड़ से चल कर नैनवा आ गए थे। इनका एक परिवार सेमली होता हुआ बकानी आ कर बस गया जिसके वंशज वर्तमान आचार्य परिवार के सदस्य हैं। बकानी के ब्राह्मण समुदाय में कुछ परिवार “जोधपुरा” कहलाते हैं। बताया जाता है कि गुजरात के जोधपुर स्थान से आने के कारण ये जोधपुरा कहलाए जाने लगे। किंतु एक अन्य जनश्रुति के अनुसार जोधपुरा ब्राहमण परिवार मूल रूप से पाली जिले के थे जहां उन्हें राज्य द्वारा जागीर प्राप्त थी। बाद में, राजा से विवाद होने पर ये लोग राजगढ़ (म.प्र.) होते हुए झालावाड़ जिले में आ बकानी व अन्य स्थानों में बस गए।

न केवल वैश्य एवं ब्राहमण परिवार अपितु कुछ राजपूत परिवार नागौर जिले से निकल कर बकानी क्षेत्र में आ कर बस गए थे| इनमे से बाद में बकानी के किलेदार भी बने| लुहारी कार्य के लिए प्रसिद्द मोडी के लुहार भी नागौर जिले से ही बकानी क्षेत्र में आ कर स्थापित हुए थे|           

मेडतवालों के बकानी आने के लगभग 50 वर्ष पश्चात जिला नागौर के मेड़ता कस्बे से ही चौथमलजी तातेड़ और ग्राम बोरावर (तहसील परबतसर) जिला नागौर से बाघमलजी सिंघवी भी बकानी में व्यापार-व्यवसाय के लिए आ गए। ये दोनो परिवार रिश्ते में साले (तातेड़) व बहनोई (सिंघवी) थे। आरंभ में ये श्री ओंकारलालजी संगी (मेड़तवाल) के नोहरे-मकानों में रहे। श्री ओंकारलालजी संगी के बारे में प्रसिद्ध है कि कोटा दरबार के बकानी आने पर उन्होनें महाराज की पधरावणी के लिए सोने की मोहरें बिछाई थी जिन्हें बाद में महाराज को भेंट कर दिया था। संगीजी की बावड़ी अपनी स्थापत्य शैली और विशालता के लिए बकानी क्षेत्र में आज भी प्रसिद्ध है। कोई संतान नहीं होने के कारण संगी परिवार ने खिलचीपुर के अपने संबंधी को गोद लिया था। किंतु बाद में वे बकानी नहीं रहे और संगी परिवार के मकान-जमीन को बेच कर वापस चले गए।        

श्री चौथमलजी तातेड़ के पुत्र चंपालालजी तातेड़ के संतान न होने से उन्होने मेड़ता से अपने नजदीकी रिश्तेदार श्री हीरालालजी तातेड़ को बकानी बुला कर गोद लिया था। यही श्री हीरालालजी तातेड़ ग्राम पंचायत की स्थापना होने पर बकानी के प्रथम सरपंच बने थे। इससे स्पष्ट है कि बकानी में स्थापित होने के बाद भी 2-3 पीढ़ी तक बकानी के इन परिवारों का मारवाड़ से संपर्क बना रहा व धीरे-धीरे बकानी के सुरक्षित वातावरण की जानकारी पा कर ओसवालों की अन्य गोत्रों के परिवार भी यहां आ कर स्थापित होते गए।

नागौर जिले से आए हुए ये मारवाड़ी (ओसवाल व मेड़तवाल) परिवार अफीम और मनौती (Money Lending) का व्यवसाय करते थे। इन लोगों ने झरोखे वाले भव्य भवन व दुकानें निर्मित की जो आज भी बकानी की समृद्धि के प्रतीक के रूप में पुराने बाज़ार में स्थित हैं। इन भवनों की निर्माण शैली में मारवाड़ की प्राचीन हवेलियों की झलक है। दुकानों की बनावट से स्पष्ट है कि ये दुकानें खुदरा व्यापार के लिए नहीं अपितु सेठ-साहूकारों की पैढ़ियों के रूप में बनवाई गई थी, जहां गादी-तकिए लगे रहते थे और छत में हाथ से खींचने वाला पंखा लगा रहता था। इन सभी सेठ-साहूकारों के मनौती (लेन-देन) वाले किसान परिवार व गांव निश्चित थे। किसान हर वर्ष फसल आने पर बैसाख सुदी पूनम तक उसे अपने पारिवारिक साहूकार को बेच पिछले ऋण का भुगतान कर देते थे। फिर, आषाढ़ मास से खाद-बीज व घरेलू कार्यों के लिए वर्ष-पर्यंत इन सेठ-साहूकारों से आवश्यकतानुसार उधार लेते रहते थे। लेन-देन के सिलसिले में किसान बकानी आते थे तो रहने-खाने की व्यवस्था उनके साहूकार के नोहरे में होती थी। साहूकार की ओर से उन्हें आटा-दाल आदि सामग्री दी जाती थी जिससे दाल-बाटी बना कर किसान नोहरे में रात्रि विश्राम करते थे।          

यह उल्लेखनीय है कि रीछवा, रटलाई और भालता ग्राम बकानी से अधिक प्राचीन और विकसित कस्बे थे। आरंभ में कोटा रियासत की तहसील रीछवा में थी जिसके अंतर्गत बकानी ग्राम आता था। मारवाड़ से आए हुए मेड़तवाल, ओसवाल व ब्राह्मण परिवारों द्वारा बकानी को अपनी कर्मस्थली बनाने के पश्चात इस स्थान का विकास तेजी से हुआ और व्यापार-व्यवसाय की दृष्टि से इसने इन तीनों कस्बों को पीछे छोड़ दिया। कोटा रियासत द्वारा बकानी के सामरिक महत्व और समृद्ध व्यापारिक स्थिति को देखते हुए परकोटा और किला बनवाया तथा रीछवा से तहसील को हटा बकानी में तहसील स्थापित की गई। इसके साथ ही यहां पुलिस थाना, अस्पताल व स्कूल बनाया गया। यह एक अलग बात है कि कई दशकों तक तहसील रहने के बाद राजनीतिक कारणों से सन 1962 में बकानी तहसील को उप-तहसील बना दिया और तब से बकानी झालरापाटन तहसील के अन्तर्गत है। किले के निर्माण से पूर्व बकानी में एक इमारत थी जिसे जूनी गढ़ी कहते हैं जिसमें पुलिस रहती थी और यहां कैदियों को लकड़ी की कोड़ा-बेड़ी में बांध कर रखा जाता था। परकोटे का निर्माण होने के पश्चात रात में बाज़ार का दरवाजा बंद होता था। ग्राम पंचायत बनने के बाद सन 1944 में चूने के चबूतरे से लेकर बाज़ार के दरवाजे तक खुरंजे का निर्माण हुआ। बिजली की सुविधा नहीं होने के कारण गलियों-रास्तों मे खंभों पर लालटेन लगाए हुए थे, जिनमें ग्राम पंचायत का कर्मचारी संध्या के समय सफाई कर तैल-बत्ती की व्यवस्था करता था। समसामयिक जानकारी के लिए ग्राम पंचायत ने पुस्तकालय आरंभ किया और साथ में बाज़ार के दरवाजे पर लाउड स्पीकर से रात को 8 बजे की रेडियो न्यूज प्रसारित की जाती थी।      

सन 1850 के पश्चात अगले 100 वर्षों तक बकानी की अर्थव्यवस्था उत्तरोत्तर प्रगति करती गई और इसे बकानी का स्वर्णिम काल कहा जा सकता है। नि:संदेह, इस अवधि में प्रथम विश्व युद्ध (1914-18), द्वितीय विश्व युद्ध (1938-42) और सन 1930 की वैश्विक आर्थिक मंदी के कारण कई उतार-चढ़ाव भी देखने को मिले। किंतु बकानी में मारवाड़ से आए इन व्यवसायियों की उद्यमशीलता और संचित पूंजी के कारण यहां की आर्थिक स्थिति काफी सुदृढ़ हो चुकी थी और सभी प्रकार के झंझावातों का सामना करने में सक्षम थी। आनुवांशिक रूप से इन लोगों में व्यावसायिक कौशल कूट-क़ूट कर भरा हुआ था, क्योंकि प्रागैतिहासिक काल में जोधपुर संभाग में विशाल समुद्र हिलोरें लेता था और इस समुद्री मार्ग से इन  व्यापारियों के पूर्वज जहाजों में माल भर कर व्यापार के लिए अरब, अफ्रीकी व यूरोपीय देशों तक जाया करते थे। बचपन में हम कहानी-किस्सों में सात समंदर पार व्यापार करने जाने की जो बातें सुनते थे वह एक वास्तविकता थी। कालांतर में, भूगर्भीय परिवर्तनों के कारण वह विशाल सागर यहां से दूर हटता गया और अपने पीछे रेगिस्तान छोड़ गया, जिसे वर्तमान में थार का मरुस्थल कहते हैं। इसके पश्चात भौगोलिक (अकाल) व राजनीतिक (युद्ध) कारणों से मारवाड़ क्षेत्र से जनसंख्या के पलायन की प्रक्रिया आरंभ हुई जो कई सहस्त्राब्दियों से निरंतर चलती आ रही है। मारवाड़ से व्यावसायिक प्रतिभा (Business acumen), उद्यमिता और पूंजी का पलायन जहां एक ओर कलकत्ता और बम्बई जैसे व्यापारिक केंद्रों के विकास का हेतु बना, वहीं इसके कारण बकानी जैसे दूरस्थ सुषुप्त गांव (sleeping village) भी स्थानीय स्तर के हिसाब से सक्रिय व्यापारिक गतिविधियों के केंद्र बने और समृद्धि के पथ पर अग्रसर हुए।                        
बकानी का प्रथम बृहद उद्योग: बकानी में कपास की काफी पैदावार होती थी किंतु यहां जिनिंग फ़ैक्टरी न होने के कारण रूई बनवाने के लिए यहां से कपास को तीनधार या माचलपुर के जीण (जिनिंग फ़ैक्टरी) पर बैलगाड़ियों से ले जाना पड़ता था जो कि श्रमसाध्य होने के साथ जोखिमभरा कार्य हुआ करता था। कहा जाता है कि एक बार तीनधार के जीण पर कपास को लोढ़ाने को लेकर हुए विवाद से उत्पन्न स्थिति को व्यवसाय की एक नई संभावना मानते हुए श्री भैरुलालजी घाटिया ने पहल कर सन 1926 में बकानी में जिनिंग फ़ैक्टरी की स्थापना की परियोजना बनाई। उन्होने कोटा राज्य से थोबड़िया के माल में जमीन आवंटित कराई। बंबई से बॉयलर व अन्य मशीने रेल मार्ग से रामगंजमंडी लाए और फिर वहां से सड़क मार्ग से बैलगाड़ियों द्वारा बकानी लाए। जीण सन 1927 में आरंभ हो गया था और जीण की प्रबंध-व्यवस्था श्री भैरुलालजी घाटिया के जिम्मे थी। वित्तीय दृष्टि से यह एक संयुक्त उपक्रम था जिसमें विभिन्न व्यवसायियों की हिस्सेदारी निम्नलिखित थी:
थोबड़िया (बकानी) में सन 1927 में स्थापित जिनिंग फ़ैक्टरी में हिस्सेदारी
1.       मे. रत्तीराम भैरुलाल घाटिया, बकानी           5 आना हिस्सा (31.25%)
2.       मे. बनवारीलाल बिट्ठलदास माहेश्वरी, इकलेरा   5 आना हिस्सा (31.25%)
3.       मे. कन्हैयालाल इंदरमल बोथरा, बकानी        2 आना हिस्सा (12.50%)
4.       मे. बच्छराज गेन्दमल तातेड़, बकानी          2 आना हिस्सा (12.50%)
5.       मे. पन्नालाल भीकमचंद बोथरा, बकानी        2 आना हिस्सा (12.50%)

सन 1930 की आर्थिक मंदी (Great Depression) के भीषण दौर में रूई की कीमतें धराशायी होने से काफी नुकसान होने पर जीण को बंद करना पड़ा। बाद में, श्री चांदमलजी बोथरा ने अन्य भागीदारों का हिस्सा खरीद सन 1954-55 इसे पुनः चालू किया, पर बकानी क्षेत्र में कपास की फसल का रकबा कम होते जाने से यह जीण नहीं चला व मशीनरी आदि बेच दी गई। इस फ़ैक्ट्री की जमीन का स्वामित्व अभी श्री माणकचंदजी ज्ञानचंदजी बोथरा के पास है।     

बकानी के व्यापारिक समुदाय की प्रतिष्ठा का एक उदाहरण यह भी है कि ग्राम पंचायत की स्थापना होने से पूर्व गांव के लोगों के आपसी विवादों का निपटारा सर्वश्री कंवरलालजी घाटिया, इन्दरमलजी बोथरा व चन्दरलालजी घाटिया करते थे। उनका फैसला सर्वमान्य होता था। इसी प्रकार दीपावली के त्योहार के बाद रियासत की ओर से नाज़िम, थानेदार व अन्य अधिकारी बाज़ार में रामा-शामी करने के लिए निकलते थे। इनका स्वागत श्री हीरालालजी बच्छराजजी तातेड़ की दुकान पर होता था।

कानी के वैश्य समुदाय की एक विशेषता यह भी है कि यही एक ऐसा कस्बा है जहां मेड़तवालों और ओसवालों के अलावा वैश्य समाज की अन्य जातियों के परिवार जैसे दिगंबर जैन, माहेश्वरी, पोरवाल, विजयवर्गीय, पालीवाल और अग्रवाल इत्यादि कार्यरत नहीं हैं। अपवाद स्वरूप केवल एक दिगंबर जैन श्रीमाल परिवार और एक हिम्मतगढ़ वाले अग्रवाल परिवार हैं। दो परिवार खत्रियों के भी थे – श्री बालचंदजी व श्री किशनलालजी खत्री। जबकि रीछवा, रटलाई और भालता में वैश्य समाज के सभी घटक व्यापार-व्यवसाय में कार्यरत थे। श्रीमाल दिगंबर जैन परिवार के प्रसंग में यह उल्लेखनीय है कि श्री भूरामलजी श्रीमाल लगभग 180 वर्ष पूर्व नैनवा (बून्दी जिले) से बकानी के श्री सांवरलालजी तातेड़ की सहायता से यहां आए थे। श्री भूरामलजी के पुत्र श्री देवलालजी यहां के पहले व्यक्ति थे जो असिस्टेंट रेवेन्यू कमिश्नर जैसे उच्च पद पर पहुंचे। श्री देवलालजी के दत्तक पुत्र श्री नरोत्तमराजजी (नमजी) ने जैन भजन गायक के रूप में अखिल भारतीय स्तर पर ख्याति अर्जित की। रेवेन्यू विभाग के उच्च पद के प्रसंग में बकानी के दो व्यक्तियों श्री दीनदयालजी शर्मा  एवं श्री रामनारायणजी कुशवाह का उल्लेख भी आवश्यक है जो  मध्यप्रदेश में संयुक्त कलेक्टर के पद से सेवा निवृत्त हुए।
मारवाड़ से आए हुए इन परिवारों ने न केवल अपने आवास व व्यवसाय के लिए भव्य भवन बनाए अपितु मंदिर, स्थानक व रामद्वारा आदि भी स्थापित किए। मेड़तवालों ने एक मंदिर बोहरे के कुए के पास बनवाया था जिसे बंशीवाले के मंदिर के नाम से जाना जाता है। इनका एक रामद्वारा भी है। मे. सालगराम देवलाल जुलानिया परिवार ने भी एक निज मंदिर अपने मकान के पास बनाया हुआ है। श्री हंसराजजी तातेड़ की एक धर्मशाला भी वर्तमान में है।      

जैन मंदिर की स्थापना: ओसवाल परिवारों के बकानी आने के लगभग 100 वर्ष बाद बैसाख सुदी तीज संवत 1928 को वर्तमान जैन मंदिर की नींव रखी गई थी। मंदिर के शिलालेख के अनुसर राणा पृथ्वीसिंहजी ने सावन सुदी तीज संवत 1929 को नौ बीघा तीन बिस्वा जमीन जैन मंदिर के लिए बखशीश दी थी। इस भव्य मंदिर का निर्माण संवत 1945 में पूर्ण हुआ।

बकानी की प्रथम धर्मशाला: संवत 1975 (सन 1919) में श्री भैरुलालजी घाटिया ने बकानी के हाट-चौक में स्थित स्वयं के स्वामित्व की खसरा नं 616 की 3 बिस्वा व खसरा न. 617 की 5 बिस्वा भूमि पर उनकी पूज्य माताजी की पुन्य स्मृति में एक धर्मशाला का निर्माण सार्वजनिक हित में स्वयं के खर्चे से करवाया था। इसका निर्माण संवत 1977 (सन 1921) में पूर्ण हो गया था। यह धर्मशाला यात्रियों के ठहरने, शादियों व अन्य सामाजिक कार्यों के लिए काम आती थी। सन 1940 में श्री भैरुलालजी घाटिया की स्थिति ठीक न रहने के कारण उन्होने इसे ग्राम पंचायत बकानी को प्रबंध-व्यवस्था हेतु सुपुर्द की थी। बाद में, इस धर्मशाला भवन का उपयोग एक सरकारी स्कूल के लिए होने लगा। सन 1980 में सरपंच ग्राम पंचायत बकानी नें जनता के विरोध के बावजूद  इस धर्मशाला के सार्वजनिक उपयोग की उपेक्षा कर यहां पक्की दुकानें बना उन्हें किराये पर दे इसका कमर्शियल उपयोग करना आरंभ कर दिया और ग्राम पंचायत कार्यालय का अनाधिकृत निर्माण करा लिया। यह दुर्भाग्य की बात है कि निहित स्वार्थ और क्षुद्र राजनीति के कारण जनहितार्थ बनाई गई इस धर्मशाला को समाप्त कर दिया गया। ग्राम पंचायत के इस कृत्य से जहां एक सामुदायिक सुविधा समाप्त हुई, वहीं बकानी की एक प्राचीन धरोहर भी लुप्त हो गई।           

मारवाड़ से आए इन व्यवसायी परिवारों ने बकानी आने के बाद मनौती के अलावा अफीम के निर्यात से भी काफी धन अर्जित किया। बकानी से अफीम बम्बई भेजी जाती थी जिसे वहां से समुद्री मार्ग द्वारा चीन भेजा जाता था। बकानी के कुछ साहूकारों की हुंडियां देश के कई नगरों में वहां के स्थानीय साहूकारों के यहां मान्य थी। तीर्थ यात्रा पर जाने वाले लोग बकानी के साहूकारों के यहां रुपये जमा करा उनसे हुंडियां लेते थे और फिर इन हुंडियों को परदेस में सिकरा कर आवश्यकतानुसार रुपये प्राप्त करते थे।

समय के साथ-साथ, बकानी में अफीम व मनौती के अलावा अन्य व्यापार-व्यवसाय भी विकसित हुए। उदाहरण के लिए किराने के व्यापार में दो परिवारों की अच्छी ख्याति थी:
1.       मे. शिवनारायण मथुरालाल थोदिया -  ये गोन्द के व्यापार के लिए भी जाने जाते थे।
2.       मे. कनकमल मन्नालाल भंडारी - गरवाडा के किसान परिवार अपना लेनदेन इनके यहां करते थे।  

किराने और कपड़े के व्यापार में कई मेडतवाल व ओसवाल परिवार संलग्न थे। इसके अतिरिक्त, दो ब्राहमण परिवारों के नाम भी उल्लेखनीय हैं – श्री लक्ष्मीनारायणजी द्विवेदी और श्री गोरधनलालजी। यहां देशी घी के कई व्यापारी थे क्योंकि बकानी का घी अपनी उत्तम क्वालिटी के कारण हाड़ौती व मालवा में प्रसिद्ध था।

बकानी में एक दाऊदी बोहरा परिवार भी था, जिनकी बोहरा के कुए के पास दुकान थी। इसी प्रकार कुछ   मुसलमान परिवार भी व्यापार में संलग्न थे जिनमे फकीर मोहम्मदजी का नाम उल्लेखनीय है। अधिकांश मुसलमान परिवार हस्तशिल्प व्यवसाय जैसे कि लखारे, नीलगर, पिंजारे, भड़भूंजे इत्यादि कार्यों में संलग्न थे। बकानी गांव की तीन दिशाओं (पूर्व, दक्षिण व पश्चिम) में तिंदु की घनी राड़ियों (जंगल) से घिरा होने के कारण यहां तेंदू पत्ते के कार्य से भी कई लोगों को रोजगार मिलता था। बकानी की सामाजिक व्यवस्था की यह विशेषता रही है कि यहां विभिन्न जाति-समुदायों के बीच समरसता व सौम्य भाव रहा है और सुख-दुख में एक-दूसरे का साथ देते थे।

बकानी का प्रथम सुपर स्टोर: श्री रघुनाथजी सोनी (माथन्यावाले) जो स्वयं तो शिक्षक थे पर उनके दो पुत्रों ने मे. मुरलीमनोहर वंशगोपाल के नाम से बाज़ार के दरवाजे के पास किराये की कवेलूपोश दुकान में जनरल स्टोर आरंभ  किया। उनके अथक परिश्रम व व्यावसायिक कौशल से इसका आशातीत विस्तार हुआ। इनके यहां किराना, मनिहारी, होजरी, कपड़े, स्कूली पुस्तकें, स्टेशनरी, दवाइयां, अखबार, हार्डवेयर, चप्पल-जूते आदि सभी वस्तुयें मिलती थी। इस फर्म की विशेषता यह थी कि सभी वस्तुयें लागत-कीमत में एक निश्चित दर से लाभ जोड़ कर बेची जाती थी। इस कारण लोगों में इस फ़र्म की साख स्थापित हो गई। लगभग 65 वर्ष पुराने उस उद्यम के बारे मे सोचने पर आश्चर्य होता है कि जिस समय सुपर स्टोर की कोई अवधारणा नहीं थी, इन सोनी बंधुओं ने इसे सफलतापूर्वक विकसित कर बकानी के व्यापरिक जगत में एक कीर्तिमान स्थापित किया।

गन्ने की चर्खियां: बकानी क्षेत्र में गन्ना बहुतायत से होता था। अतः गन्ने को पेलने के लिए उस समय “चर्खी” मशीन विकसित हुई थी। इसमें व्यवसाय की संभावना को देख लगभग सभी साहूकार अपने यहां स्वयं के उपयोग और किसानों को किराए पर देने के लिए 2-4 चर्खियां अवश्य रखते थे, किंतु किराये की चर्खियों के लिए दो फर्में विशेष रूप से प्रसिद्ध थी:
1.       मे. सालगराम देवलाल जुलान्या
2.       मे. जड़ावचंद भीकमचंद बोथरा
मे. सालगराम देवलाल जुलान्या के व्यवसाय की एक विशेषता यह भी थी कि सारे गाड़लिये लुहार व मोड़ी के लुहार अपना वित्तीय लेनदेन इनके यहां ही करते थे।

प्रसंगवश, यह भी उल्लेख करना आवश्यक है कि आरंभ में बकानी का मुख्य बाज़ार बड़े मंदिर के चौक में था। फिर जैसे-जैसे मारवाड़ से परिवार आते गए, बाज़ार पंचायत के दरवाजे तक बढ़ा और तत्पश्चात जनसंख्या में वृद्धि के कारण बढ़ती हुई मांग की पूर्ति के लिए दुकाने पंचायत के दरवाजे के नीचे बनती गई, टीकमचंदजी की बाड़ी में भी दुकानें बन गई। अब तो बकानी का बाज़ार हाट चौक को पार करता हुआ सभी ओर फैलता जा रहा है।

आरंभ में, यहां उद्योगों के नाम पर पारंपरिक हस्तशिल्प (सुथारी, लुहारी, चर्मकारी व कुम्हारी आदि) कार्य ही होते थे। मशीन-आधारित लघु उद्योगों में सर्वप्रथम लखमीचंदजी बाफना के नोहरे में मांगीलालजी मिस्त्री ने आटा-चक्की आरंभ की थी। फिर, आत्मासिंहजी जगन्नाथजी पंजाबी, रिद्धकरणजी सिंघवी और दीपचंदजी जुलानिया आदि ने आटा-चक्कियां लगाई थी। वर्तमान में यद्यपि कोई बड़ा उद्योग नहीं हैं, पर स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप कई लघु उद्योग संचालित हो रहे हैं। बकानी में सबसे पहली बस मोड़ी के लुहार ने खरीदी थी और पहला ट्रक श्री नंदलालजी घाटिया ने खरीदा था। 

कुछ और नाम भी उल्लेखनीय हैं जो अपने कार्य-विशेष के कारण प्रसिद्ध थे। आतिशबाजी के लिए श्री रिद्धकरणजी सिंघवी का नाम उल्लेखनीय है। केरोसीन तेल का लाइसेंस भायाजी सूरजमलजी तातेड़ के पास था और शनिवार को हाट में चबूतरे के पास जब वे ड्रमों में तेल भर कर बैठते थे तो ग्राहकों की लंबी लाइन लग जाती थी। मिठाई के मामले में श्री बालचंदजी खत्री की दुकान प्रसिद्ध थी। बाद में, श्री अमरलालजी छीपा और श्री भवानजी काछी का कलाकंद भी प्रसिद्ध हुआ। श्री दीपचंदजी छीपा के सेव-पपड़ी प्रसिद्ध थे। सब्ज़ियों व फलों के लिए ख्वाजूजी कूंजड़ा के कारण दरवाजे का बाज़ार गुलजार रहता था।

सांपों से सभी को डर लगता है और इस डर को दूर करने के लिए बकानी में सर्प विशेषज्ञ शकूरजी का नाम उल्लेखनीय है। किसी के भी यहां सांप दिखता था तो तुरंत शकूरजी को बुलाया जाता था, वे आते और सांप को पकड़, मटके में बंद कर जंगल में छोड़ आते थे। उनके बाद, बाबूखांजी इस कार्य को करने लगे। पथरीला इलाका होने के कारण बकानी में विशेष रूप से तालाब के किनारे, बिच्छू बहुत पाए जाते थे जिन्हें किशोर बालक मनोरंजन के लिए पकड़ कर माचिस की डिब्बी में बंद कर रखते थे।                          

साप्ताहिक हाट: शनिवार का साप्ताहिक हाट बकानी की सुदृढ़ अर्थव्यवस्था का प्रतीक है और इसका हाड़ौती-मालवा में आसपास स्थित सभी गांवों-कस्बों के हाटों में अग्रणी स्थान है। इसके दो मुख्य  कारण हैं। प्रथम, बकानी के आसपास 5-7 किलोमीटर के दायरे में कई छोटे-छोटे गांव स्थित हैं जहां के निवासीयों के लिए कृषि व संबद्ध उत्पादों को बेचने और अपनी घरेलू आवश्यकताओं का सामान खरीदने के लिए बकानी का हाट सुविधाजनक है। द्वितीय, बकानी के स्थानीय व्यापारियों की अच्छी साख है। यह हाट पशुओं के क्रय-विक्रय के लिए भी प्रसिद्ध है। ग्राम पंचायत ने बकानी में (लाल माताजी के मैदान में) मेला लगाने का भी प्रयास किया था। पर यह प्रयास  सफल नहीं हुआ क्योंकि यहां हाट के माध्यम से जनसमुदाय की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति हो जाती है। यह संतोष की बात है कि आधुनिक काल में भी बकानी के साप्ताहिक हाट का व्यापारिक महत्व कम नहीं हुआ है और इसने एक प्रकार से साप्ताहिक मिनी मेले का रूप ले लिया है।                 

इस प्रकार विगत 300 वर्षों की यात्रा में बकानी ग्राम की आरंभिक कृषि-प्रधान अर्थव्यवस्था का झुकाव अब मुख्यतः सेवा क्षेत्र (Service/Tertiary Sector) की ओर है। प्रो. रघुनंदनजी आचार्य द्वारा 2011 की जनगणना के आंकड़ों पर आधारित अध्ययन के अनुसार, "बकानी की कुल कार्यशील जनसंख्या में कृषक का प्रतिशत 12.13% तथा अन्य कार्यशील का 87.86% था| बकानी गाँव के कुल क्षेत्रफल में कृषि भूमि का क्षेत्रफल वर्ष 2013-14 में 60.23% था| इन आंकड़ों के विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि बकानी कस्बे में अन्य कार्य एवं सेवाएँ भी प्रमुखता से की जाती हैं| बस्ती निरंतर नगरीय कार्यों की ओर अग्रसर है|" 

विगत 50 वर्षों में बकानी से कई लोग बाहर बड़े शहरों में गए हैं। किंतु उससे अधिक संख्या में, आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से नए परिवार बकानी में आ कर स्थापित भी हुए हैं। इस कारण बकानी की जनसंख्या जो 1960 में 3823 थी, 2011 में बढ़ कर 9812 हो गई है।             

यह एक सुखद तथ्य है कि मारवाड़ से चल कर कई स्थानों पर रुकते-रुकते जो भी परिवार बकानी आए, वे इस शस्य श्यामला भूमि के मुरीद बन सदियों तक यहीं के हो कर रह गए। अब लगभग सात पीढ़ियों के पश्चात, पुनः एक नया संक्रांति काल आरंभ हो रहा है, जिसके अंतर्गत  पिछले कुछ दशकों से बकानी के कई परिवार व्यापार-व्यवसाय-शिक्षा-रोजगार के अनुसरण में देश-विदेशों में जा कर अलग-अलग कार्यक्षेत्रों में बकानी का नाम रोशन कर रहे हैं और वे वहां “बकानीवाला” के नाम से जाने जाते हैं। संभव है कालांतर में, “बकानीवाला” या “बकानीवाल” भी एक नया उपनाम बन जाए, जैसा कि महाराष्ट्र में प्रचलन है कि वहां अधिकांश उपनाम व्यक्ति के गांव के नाम पर आधारित होते हैं।

इस लेख को विराम देने से पूर्व यह उल्लेख करना आवश्यक है कि अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र व इतिहास की दृष्टि से बकानी क्षेत्र में शोध की विपुल संभावनाएं हैं। प्रतिभाशाली युवा छात्रों को अपनी शैक्षणिक गतिविधियों के रूप में इस कार्य को हाथ में लेना चाहिए। 


“इतिहास की यत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिए। धन के नष्ट हो जाने पर कुछ नष्ट नहीं होता, परंतु इतिहास के नष्ट होने पर विनाश निश्चित है।“                                      
                                      - महर्षि वेदव्यास, महाभारत    


संदर्भ सूची:
1. Annals & Antiquities of Rajasthan or The Central & Western Rajput States, Tod James, 1920, Humphrey Milford, Oxford University Press  
2. कोटा राज्य का इतिहास (दो भाग), डा. मथुरालालजी शर्मा, 1940 एवं 1996 में डा. जगतनारायणजी द्वारा संपादित, राजस्थानी ग्रंथागार 
3. अखिल भारतीय मेड़तवाल वैश्य समाज का इतिहास, बंशीधर गुप्ता “श्याम”, 2008, 
4. Hindu kingship and polity in precolonial India, Norbert Peabody, 2003, Cambridge University Press, Cambridge Studies in Indian History & Society Series.
5. बकानी – भौगोलिक परिप्रेक्ष्य, 2015, श्री रघुनंदनजी आचार्य
6. श्री बालचंदजी व्यास बकानी से वार्ता दिनांक 28 12 2012
7. श्री हंसराजजी तातेड़ बकानी से वार्ता दिनांक 12 03 2015
8. श्री गौतमराजजी सिंघवी बकानी से वार्ता दिनांक 12 03 2015
9. श्री मधुसूदनजी आचार्य बकानी (वर्तमान में झालावाड़ निवासी) से समय-समय पर हुई वार्ताएं  
10. श्री दीनदयालजी शर्मा बकानी (वर्तमान में इंदौर निवासी) से समय-समय पर हुई वार्ताएं 
11. श्री राजकुमारजी जैन (टिल्लूजी), बकानी (वर्तमान में झालरापाटन निवासी) से दिनांक 10 06 2015 को हुई वार्ता
12. श्री महेन्द्रकुमारजी जैन (भंडारी), बकानी से समकालीन स्थितियों के बारे में समय-समय पर हुई वार्ताएं
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नोट: यह लेख पूर्व छात्र सेवा समिति - राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, बकानी, जिला झालावाड़ (राजस्थान) के तत्वाधान में आयोजित शताब्दी समारोह 2015 की स्मारिका में प्रकाशित हुआ था|  
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काला धन: कितना काला


काला धन: कितना काला?
                                                

                                                          - एस. एन. घाटिया
27 सितम्बर 2012 

हाल ही में भारत की जनता मूक दर्शक की तरह देखती रही कि कोयले की कलुष कालिमा और विषाक्त धुएं ने किस तरह भारतीय संसद के मानसून सत्र (2012) को पंगु बना कर रख दिया था. संसद के भीतर-बाहर राजनीतिक पार्टियों के आरोपों-प्रत्यारोपों नें सामान्य नागरिक के मन में संपूर्ण व्यवस्था के प्रति अविश्वास सुदृढ़ कर दिया है. उसे अब इस देश में अपने भविष्य की चिंता सताने लगी है. टीवी या अखबार खोलते समय यह दुश्चिंता रहती है कि आज कौन सा नया घोटाला उजागर होगा! अब टीवी चैनलों को पारिवारिक राग-द्वेष के घिसे-पिटे सीरियल दिखाने की जरूरत नहीं है. उन्हें बस इतना करना है कि अलग-अलग दलों के नेताओं को विभिन्न क्षेत्रों में व्याप्त घोटालों पर चर्चा करने के लिए एक मंच प्रदान कर दें और फिर देखिए कैसे वे एक-दूसरे के कार्यकाल में किए हुए घोटालों की परतें खोलते हैं.

भ्रष्टाचार और काले धन में पारस्परिक कार्य-कारण संबंध है. एक ओर, काले धन की उत्पत्ति का कारण देश में व्याप्त भ्रष्टाचार है तो दूसरी ओर काले धन के कारण भ्रष्टाचार बढ़ रहा है, क्योंकि जिसके पास काला धन है वह उसके बल पर अपने जायज-नाजायज सभी कार्य कराने में समर्थ हैं. भ्रष्टाचार को शिष्टाचार के रूप में स्वीकार कर लिया गया है. भ्रष्टाचार और काले धन के इस दुष्चक्र से सामान्य नागरिक संत्रस्त है. हर कोई चाहता है कि भ्रष्टाचार व घोटालों में लिप्त लोगों को कड़ी-से-कड़ी सजा दी जाए, चाहे वे कितने ही प्रभावशाली या किसी भी राजनीतिक दल से क्यों न हो. विभिन्न मंचों से यह मांग भी उठ रही है कि विदेशों में जमा काले धन को वापस लाया जाए, जिससे देश के आर्थिक विकास को गति मिल सके. भ्रष्टाचार और काले धन के विरुद्ध कई सरकारी/गैर-सरकारी संस्थाएं कार्यरत हैं और कई विशाल जन-आंदोलन भी आयोजित किए जा चुके हैं. सिद्धांततः और घोषित रूप से, सरकार के तीनों अंग – विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका - भी भ्रष्टाचार और काले धन के विरुद्ध है और इनके उन्मूलन व रोकथाम के लिए कई कानून व नियम भी बने हुए हैं.

भ्रष्टाचार पर अंकुश हेतु लोकपाल की नियुक्ति के मुद्दे पर अगस्त 2011 में साफ-सुथरी छवि वाले समाजसेवी अन्ना हज़ारे के नेतृत्व में चलाए गए आन्दोलन से देश में एक नवीन आशा का संचार हुआ था. इस आन्दोलन को आशातीत जन-समर्थन मिला और सरकार चारों तरफ से घिर गई थी. India Against Corruption Civil Society जैसी स्वच्छ छवि वाली गैर-राजनीतिक संस्थाओं के तत्वाधान में भ्रष्टाचार और काले धन के सर्वव्यापी दैत्यों से मुक्ति मिलने की आशा बंधी थी. किंतु एक वर्ष में ही टीम अन्ना में मतभेद गहराते चले गए, आन्दोलन की सफलता के लिए राजनीतिक दल बनाने की बात होने लगी और जनहित पर व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं हावी होने लगी. सितंबर 2012 में अन्ना हज़ारे नें सार्वजनिक घोषणा कर दी कि टीम के सदस्यों द्वारा एक नई राजनीतिक पार्टी बना कर चुनाव लड़ने के प्रस्तावों से वे असहमत हैं. यह भी बताया गया कि अरविन्द केजरीवाल के एनजीओ इंडिया अगैंस्ट करप्शन को 1 अप्रैल 2011 से 30 सितंबर की अवधि में कुल रु.2.94 करोड़ का चंदा मिला था, जिसमे से रु.1.57 करोड़ आंदोलन पर खर्च हुए थे. संबंध विच्छेद हो जाने पर, अरविन्द केजरीवाल नें चंदे की शेष राशि लगभग रु.2.00 करोड़ का चेक अन्ना हज़ारे को देने की पेशकश की, किंतु अन्ना हज़ारे नें लेने से मना कर दिया.
  
हर स्तर पर हर संभव प्रयासों के बावजूद देश में काला धन दिन-दूना और रात-चौगुना होता जा रहा है. ऐसी स्थिति में कई प्रश्न उठ रहे हैं. क्या यह माना जाए कि भ्रष्टाचार और काले धन के उन्मूलन व रोकथाम के लिए  सरकार और जनता के स्तर पर किए जा रहे प्रयासों में संकल्प की शुद्धता और दृढ़ इच्छाशक्ति का अभाव है? क्या समस्या की भयानकता को समझते हुए इसके विभिन्न आयामों का सही विश्लेषण नहीं किया गया है? क्या रक्षक ही भक्षक बने हुए हैं? क्या अपराधी स्वयं ही अनुसंधानकर्ता की भूमिका निभा रहे हैं, जिससे समस्या बढ़ती जा रही है?
समस्या को समझने के लिए काले धन की व्याख्या करना आवश्यक है. इसकी परिभाषा में मुख्य रूप से दो प्रकार की आय सम्मलित की जाती है:
1.    आपराधिक व अवैधानिक गतिविधियों से अर्जित आय/धन.
2.    वैधानिक गतिविधियों से अर्जित ऐसी अघोषित आय/धन जिस पर लागू टैक्सों का भुगतान नहीं किया जाता है.
अघोषित धनार्जन के नए-नए तरीके विकसित होते जा रहे हैं, क्योंकि भ्रष्टाचार और काले धन की रोकथाम के लिए बनाया गया हर कानून/नियम काली कमाई का एक नया स्रोत बन जाता है. काली कमाई के वर्तमान प्रचलित मुख्य तरीकों की सूची निम्नलिखित है:

आपराधिक व अवैधानिक गतिविधियां:
1.       विभिन्न प्रकार की वित्तीय धोखाधड़ी
2.       नकली व प्रतिबंधित वस्तुओं का लेन-देन
3.       नशीले पदार्थों का निर्माण, व्यापार व तस्करी
4.       खनिज पदार्थों का अवैध खनन
5.       वनों की अवैध कटाई
6.       मादक द्रव्यों का अवैध व्यापार
7.       चोरी, डकैती व अपहरण
8.       वैश्यावृत्ति व यौन शोषण के लिए मानव तस्करी
9.       हथियारों की तस्करी
10.    सरकारी व गैर-सरकारी संस्थाओं के धन का गबन एवं वस्तुओं की  चोरी 
11.    राजकीय सेवाओं के माध्यम से अनुचित लाभ (जैसे कि विभिन्न सरकारी योजनाओं के अंतर्गत लाइसेंस-परमिट-लीज-ऋण-अनुदान प्रदान करना, नियम विरुद्ध भू-उपयोग परिवर्तन, अवैध निर्माण का नियमन, नियमों की अवहेलना/कार्य की प्रक्रिया को तेज करना इत्यादि) प्रदान करने की एवज में रिश्वत लेना व सार्वजनिक पद का दुरुपयोग करना.

वैधानिक गतिविधियों से अर्जित अघोषित आय/धन:
इस श्रेणी के अंतर्गत वे आर्थिक गतिविधियां आती हैं जो वैधानिक रूप से तो स्वीकृत होती हैं, जैसे कि फर्मों व कंपनियों द्वारा किए जाने वाले विभिन्न प्रकार के व्यापारिक व व्यावसायिक कार्य-कलाप. किंतु उनसे अर्जित आय व धन को पूर्ण या आंशिक रूप से छिपा कर उन पर देय विभिन्न टैक्सों जैसे कि आय कर, बिक्री कर/वैट, एक्साइज ड्यूटी, स्टाम्प ड्यूटी व अन्य वैधानिक दायित्वों का भुगतान नहीं करना. इस प्रकार की टैक्स चोरी के प्रचलित तरीके निम्नलिखित हैं:

1.    व्यापार-व्यवसाय के कोई बही-खाते नहीं रखना.
2.    विभिन्न सरकारी विभागों को प्रस्तुत करने के लिए एक ही व्यापार-व्यवसाय के अलग-अलग बही-खाते रखना.
3.    बिना बिल/रसीद के वस्तुओं और सेवाओं की खरीद व बिक्री.
4.    बेनामी संपत्तियों में निवेश करना.
5.    बिक्री/प्राप्तियों तथा खरीद की राशियों को बही-खातों में कम दर्ज करना.
6.    खर्चों को बढ़ा-चढ़ा कर दिखाना.
7.    बिक्री को सहयोगी संस्थानों के बही-खातों में दर्शाना.
8.    उत्पादन कम बताना.
9.    गलत कीमत दिखाना.
10.  बिक्री/प्राप्तियों को बढ़ा-चढ़ा कर दिखाना.
11.  विदेशी संस्थानों को बोगस खर्चों का भुगतान दिखाना.
12.  बोगस गिफ़्ट्स देना दिखाना.
13.  कंपनियों द्वारा भारी प्रीमियम पर शेयर जारी करना दिखाना.
14.  अचल संपत्तियों की कम कीमत दर्शाना, इत्यादि.
15.  आयकर-मुक्त कृषि आय को बढ़ा-चढ़ा कर बताना.
16.  एनजीओ के माध्यम से बोगस कार्य दिखा अनुदान/चंदा लेना.  

आर्थिक विश्लेषक देश में काले धन की मात्रा के बारे में एकमत नहीं हैं. अलग-अलग आकलनों के अनुसार काला धन देश के सकल घरेलू उत्पादन (GDP) का 20 से 45 प्रतिशत तक बताया जाता है. किंतु ये सभी आकलन तथ्यों पर आधारित नहीं हैं, क्योंकि काला धन ऐसी बेहिसाबी आय है जिसके बारे मे कहीं भी, किसी के पास कोई तथ्यात्मक जानकारी नहीं होती है. मई 2012 में भारत सरकार के तत्कालीन वित्तमंत्री श्री प्रणव मुखर्जी (जो कि अभी भारत के वर्तमान राष्ट्रपति हैं) द्वारा प्रस्तुत श्वेत पत्र में यह स्वीकार किया गया है कि काले धन के सृजन अथवा संचयन के लिए कोई विश्वस्त अनुमान नहीं है, और न ही ऐसे अनुमान के लिए कोई सर्वसहमत पद्धति है.

तथ्यात्मक जानकारी के अभाव में काला धन एक ऐसा विषय बन गया है जिसे विभिन्न पार्टियां और समूह अपने राजनीतिक दांव-पेंच के रूप में उछालते रहे हैं. हाल ही में बाबा रामदेव नें विदेशों में जमा काले धन को देश में लाने के लिए फिर आन्दोलन छेड़ा है. मीडिया व आन्दोलनकर्ता काले धन के मुद्दे को सनसनीखेज बनाने के लिए आंकड़ों को बढ़ा-चढ़ा कर बताने का कोई अवसर नहीं छोड़ते हैं. ऐसा ही अतिशयोक्तिपूर्ण दावा गत वर्ष बाबा रामदेव नें किया था जब उन्होनें कहा कि काले धन की राशि भारतीय अर्थव्यवस्था के आकार से सात गुना अधिक है और इस राशि की वसूली होने पर भारतीय रुपए की कीमत 50 अमेरिकी डॉलर के बराबर हो जाएगी.
टीम अन्ना में गंभीर मतभेदों के सार्वजनिक होने के पश्चात, सामान्य नागरिक अब इस प्रकार के आन्दोलनों में सक्रिय होने से कतरा रहा है. जनहित के नाम पर व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए चलाए जाने वाले ऐसे अभियानों की विश्वसनीयता भी राजनीतिक पार्टियों की तरह संदेह के घेरे में आ गई है. टीम अन्ना के बिखराव से, अब यह स्पष्ट होता जा रहा है कि लोगों के इस आन्दोलन से जुड़ने के मूल में निस्वार्थ सेवा/त्याग की भावना कम व व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं अधिक प्रबल रही थी.
भ्रष्टाचार की परिभाषा का दायरा व्यक्ति की नैतिक मान्यताओं पर आधारित होता है. हमारे देश में ऐसे भी लोकसेवक का आदर्श उदाहरण है जो सरकारी कार्य करते समय सरकारी लैंप जलाते थे और व्यक्तिगत कार्य करते समय अपना स्वयं के लैंप का उपयोग करते थे. इसके ठीक विपरीत, वर्तमान युग में अधिकारियों के आवासीय विद्युत व्यय का भुगतान सरकारी कार्यालय के मीटर से करने में कोई हिचक अनुभव नहीं की जाती है. टीम अन्ना की एक प्रमुख सदस्य किरन बेदी अपने यात्रा व्यय का पुनर्भुगतान बढ़ा-चढ़ा कर लेना इसलिए उचित समझती हैं कि वे ऐसा अपने एनजीओ के माध्यम से समाज के बृहत्तर हित में कर रही थी. उनके मतानुसार ऐसा करने में कुछ भी अनैतिक नहीं था. किंतु यह प्रकरण सार्वजनिक होने पर इस तथाकथित उचित राशि को लौटा भी देती हैं. कोई आश्चर्य नहीं कि सरकारी कार्यों में अरबों-करोड़ों रुपयों के घोटाले जब सहज और नियमित रूप से होने लगे हैं तो यात्रा-व्यय जैसी इस प्रकार की छोटी-मोटी अनियमितताओं पर आपत्ति करना भी बेमानी हो जाता है ! भारत सरकार के श्वेत पत्र में उल्लेखित अघोषित आय/धन के लिए अपनाए जाने वाले तरीकों की सूची से स्पष्ट है कि हम में से अधिकांश लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से किसी-न-किसी स्टैज पर काले धन की निर्माण प्रक्रिया में लिप्त हैं. एक अनुमान के अनुसार आपराधिक/अवैधानिक गतिविधियों की तुलना में वैधानिक गतिविधियों से अर्जित काले धन की मात्रा अधिक है. वैधानिक गतिविधियों से प्राप्त आय को पूर्ण या आंशिक रूप से नहीं दिखाने में देश के कॉर्पोरेट घरानों से लेकर सभी वर्गों, विशेष रूप से प्रभावशाली व शिक्षित वर्ग, के नागरिक लिप्त हैं.
उक्त दोनो श्रेणियों की गतिविधियों के मूल में धन के प्रति लोभ-लालच की मानवीय प्रवृत्ति होती है जिसे प्रशासनिक ढिलाई से प्रोत्साहन मिलता है. काले धन के उन्मूलन को लेकर चिंतित हर कोई है, किंतु फिर भी समस्या लगातार जटिल होती जा रही है. इसका कारण है कि मानव जाति के इतिहास में समृद्धि और अपराध (भ्रष्ट आचरण) के तार आदिकाल से जुड़े रहे हैं. हर सभ्य समाज में संपत्ति के अधिकार को स्वीकृति दी गई है. हमारे देश की संविधान सभा नें भी संपत्ति के अधिकार को व्यक्ति का मौलिक अधिकार माना था. संपत्ति के प्रति मानव मन की अदम्य लालसा एक ओर “Right to property” जैसी वैधानिक स्वीकृतियों से सुदृढ़ होती हैं तो दूसरी ओर जिसकी लाठी उसकी भैंस (Might is right) तथा चोरी का गुड़ मीठा होता है (Forbidden fruits are sweet) जैसी लोकोक्तियों में प्रतिबिंबित होती है. कोई आश्चर्य नहीं कि अर्थ-प्रधान सामाजिक वातावरण व्यक्ति को भ्रष्ट आचरण के लिए प्रोत्साहित करता है. समृद्धि और अपराध (भ्रष्ट आचरण) के संयुक्त तारों के सन्दर्भ में यहां पौराणिक पक्ष की ओर इंगित करना भी प्रासंगिक रहेगा. धन-संपत्ति की देवी लक्ष्मी की पूजा-अर्चना का विधान कार्तिक कृष्ण पक्ष की अमावस्या की काली रात में कर हमने प्रतीकात्मक रूप से धन के श्याम वर्ण को आदि काल से ही पौराणिक स्वीकृति प्रदान कर रखी है. इतना ही नहीं, देवी लक्ष्मी के वाहन (carrier) के रूप में उल्लू को चिन्हित किया हुआ है जो कि रात्रि के अंधेरे में अपनी गतिविधियों के संचालन के लिए जाना जाता है.
इस पृष्ठभूमि में, काले धन की बहुलता एक संयोग मात्र नहीं है, बल्कि इसके लिए पीढ़ी-दर-पीढ़ी सायास प्रयत्न किए जाते रहे हैं. यही कारण है कि भारत के संवैधानिक गणतंत्र में अब ग्राम पंचायत से संसद तक वंश-परंपरा सुदृढ़ रूप से स्थापित हो चुकी है. निर्धारित योग्यता रखते हुए भी आम आदमी के लिए किसी चुनाव में निर्वाचित हो पाना टेढ़ी खीर है. धन-बल व बाहु-बल चुनाव में निर्वाचित होने की आवश्यक शर्त बन गए हैं. स्थितियां यहां तक खराब हो चुकी है कि सामाजिक संस्थाओं के पदाधिकारियों के चुनाव भी काले धन के बल पर लड़े जाते हैं. अब चुनाव समाज सेवा के लिए नहीं लड़े जाते हैं बल्कि यह एक प्रकार का निवेश माना जाने लगा है जिसके माध्यम से व्यक्ति को कई गुना धन अर्जित करने के अवसर प्राप्त होते हैं. वर्तमान राजनीतिक वातावरण में किसी भी स्तर का चुनाव लड़ने और जीतने के लिए जितना धन चाहिए वह काली कमाई से ही संभव है. यह एक खुला रहस्य है कि सभी राजनीतिक दल चुनाव लड़ने के लिए चंदा लेते हैं और सरकार बनने के बाद चंदा देने वालों की चांदी होती है.              
वर्ष 2012 में जिस गति से भारी राशियों के घोटाले सामने आये हैं, उससे ऐसा प्रतीत होना स्वाभाविक है कि अब देश में भ्रष्टाचार बेलगाम होता जा रहा है. तुलना के लिए लोग प्राय: कहते हैं कि – पहले तो कभी इतने घोटाले नहीं होते थे; देश में भ्रष्टाचार था पर आटे में नमक की तरह इत्यादि, इत्यादि. इस प्रकार के कथन तथ्यपरक नहीं हैं. भ्रष्टाचार पहले भी था और किसी भी मापदंड से उसका तुलनात्मक प्रतिशत कम नहीं था. अंतर केवल इतना है कि सरकारी कामकाज में पहले इतनी पारदर्शिता नहीं थी जो सूचना के अधिकार और कंप्यूटरीकरण के कारण अब है. पहले जनता को घोटालों का पता नहीं चलता था और वे दबा दिए जाते थे. अब सूचना के अधिकार, इंटरनेट, टीवी चैनलों व मीडिया की सक्रियता के कारण कोई भी जानकारी कुछ ही क्षणों में पूरे देश में सार्वजनिक हो जाती है. विकीपीडिया पर भारत में घोटालों की सूची शीर्षक के अंतर्गत स्वतंत्रता से अब तक के सभी घोटालों को संकलित किया गया है. विगत एक दशक में सरकार के तीनों अंगों – विधायिका, कार्यपालिका व न्यायपालिका – के बीच एक-दूसरे की कमियों को सार्वजनिक करने की प्रतियोगिता होने लगी है. एक सीमा के पश्चात ऐसा अंतर्कलह लोकतंत्र के लिए घातक सिद्ध हो सकता है. किंतु इसके कारण सरकारी कामकाज में हो रही अनियमिततायें व घोटाले जनता के सामने आ रहे हैं और चाहे-अनचाहे उन पर कार्यवाही भी करनी पड़ रही है. सार्वजनिक जीवन में स्वच्छता और पारदर्शिता के लिए यह एक अच्छा संकेत है और इसका निवारक प्रभाव (Deterrent Effect) होता है.

कई स्वतंत्र विश्लेषक मानते हैं कि आर्थिक सुधारों और संचार क्रांति के पश्चात काले धन के अनुपात में कमी हुई है. टर्की के बॉगैज़िकी विश्वविद्यालय के दो शोधकर्ताओं Ceyhun Elgin और Oguz Oztunali  नें ब्रिक्स देशों (ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और साउथ अफ़्रीका) में 1950 से 2008 के दौरान  काले धन की तुलनात्मक स्थिति के अध्ययन में पाया कि 1950 में भारत में काला धन सकल घरेलू उत्पादन (जीडीपी) का 40 प्रतिशत था जो कि 2008 में घट कर 23.71 प्रतिशत रह गया है. इस चार्ट के अनुसार काले धन को कम करने में भारत, केवल चीन को छोड़ कर, ब्रिक्स समूह (BRICS Group) के शेष अन्य देशों की तुलना में अधिक सफल रहा है. यहां यह स्पष्ट करना भी आवश्यक है कि काले धन का प्रतिशत चाहे कम हो गया हो, किंतु सकल घरेलू उत्पादन (जीडीपी) में कई गुना वृद्धि होने से काले धन की कुल राशि भी निरंतर बढ़ती जा रही है. 

किंतु जैसा कि पहले कहा जा चुका है, मात्र आंकड़ों के विवेचन से समस्या हल नहीं होने वाली है. कई अध्ययनों से व व्यावहारिक स्तर पर भी यह निर्विवाद रूप से स्पष्ट हो चुका है कि भ्रष्टाचार और काले धन के मूल में सामाजिक और मनोवैज्ञानिक कारण होते हैं. जब किसी देश में चरित्र के दोहरेपन को सामाजिक स्वीकृति मिल जाती है तो नियमों का उल्लंघन कर येन केन प्रकारेण धन अर्जित करने की प्रवृत्ति को खुली छूट मिल जाती है. भौतिकतावाद की दौड़ में धन का महत्व बढ़ने के साथ ही आदर्शों और नैतिक मूल्यों का ह्रास आरंभ हो जाता है. व्यक्ति सार्वजनिक मंच पर क्या कहता है और व्यक्तिगत जीवन में क्या आचरण करता है, इन दोनों स्थितियों में जब तक विरोधाभास रहेगा, आम आदमी को काले धन की समानांतर अर्थव्यवस्था में जिसकी लाठी उसकी भैंस जैसी त्रासदी में जीना पड़ेगा. क्या इस त्रासदी से बाहर निकलने का कोई उपाय है? इसका उत्तर इस यक्ष प्रश्न में निहित है – क्या हम लोग व्यक्तिगत स्तर पर व्यवहार के दोहरेपन को छोड़ने के लिए तैयार हैं?  

 (लेखक बैंकिंग-वित्तीय विशेषज्ञ एवं स्वतंत्र लेखक है. यह लेख 27 09 2012 को लिखा गया था.)     
                                                     
        
इस वर्ष  इस Annex of Swiss Banks - All Countries





  
       


समय प्रबंधन


समय प्रबंधन 

                                                              ,l-,u-?kkfV;k


18 दिसंबर 2012
le; izca/ku dyk gS ;k foKku - ;g fookn dk fo’k; gks ldrk हैS; fdarq thou esa le;&izca/ku dh mi;ksfxrk dks lkekU;r% lHkh Lohdkj djrs gSaA bl ys[k dk lw=ikr le;&izca/ku ij okrkZ ds nkSjku ,d Jksrk ds bl iz”u ls gqvk fd tc thou esa gj ckr HkkX; }kjk iwoZ&fuf”pr gS rks le;&izca/ku dh D;k vko”;drk gS\ LokHkkfod Fkk fd cgl le;&izca/ku ls gVdj HkkX; vkSj iq:’kkFkZ esa dkSu izcy gS ds “kk”or iz”u ij dsafær gks xbZA ;|fi HkkX; vkSj iq:’kkFkZ में से किसी एक की श्रेष्ठता सिद्ध नहीं हो सकी, इससे समय-प्रबंधन के बारे में एक नया आयाम स्पष्ट हुआ कि यह पुरुषार्थ का प्रतीक है।  vk/kqfud vFkZ&iz/kku ;qx esa] O;fDr vius thou esa ek= HkkX; ds Hkjksls u jgdj lQyrk ds fy, lfØ; iz;Ru djuk pkgrk gS vkSj blds fy, og nSfud O;ogkj esa fdlh&u&fdlh :i esa le;&izca/ku dks viukrk gSA

le; izca/ku dk iwjk ykHk ysus ds fy, ;g  समझना vko”;d gS fd le; D;k gS vkSj bldk izca/ku dSls fd;k tkk ldrk gSA tSlk कि ge tkurs gSa tUe vkSj e`R;q ij O;fDr dk fu;a=.k ugha gksrk gSA vr% O;kogkfjd ifjHkk’kk dh n`f’V ls lalkj esa tUe vkSj e`R;q ds chp dh vof/k dks O;fDr fo”ks’k ds fy, miyC/k le; dgk tk ldrk gSA दूसरे शब्दों में, हमारा समय जन्म से शुरू होता है और मृत्यु के साथ समाप्त हो जाता है। ;gh og vof/k gS ftlesa O;fDr le;&izca/ku ds माध्यम से  vius सजग प्रयास से thou esa lQyrk vkSj vkuan izkIr dj ldrk gSA प्रायः ge ns[krs gSa fd जीवन में leku volj feyus ij Hkh ,d gh {ks= esa nks O;fDr;ksa dk dSfj;j cgqr fHkUu gks ldrk gSA mnkgj.k ds fy,] ,d gh esfMdy dkWyst ls nks fo|kFkhZ ltZjh dh f”k{kk izkIr djrs gSaA nksuksa us ,d gh dkWyst esa v/;;u fd;k] nksuksa dks i<+kus okys v/;kid Hkh ,d gh Fks] nksuksa us iqLrdsa Hkh ogh i<+h] ,d gh lkFk okMks± esa izf”k{k.k fy;k] ,d gh Js.kh esa ijh{kk,a mÙkh.kZ dh] ,d gh vLirky esa ltZu ds in ij fu;qDr gq,] nksuksa ds dk;Z dk {ks= o le; ,d gh Fkk vkSj ikfjokfjd i`’BHkwfe Hkh yxHkx ,d tSlh gh jghA fdarq ltZu ds :i esa dqN o’kZ dh izsfDVl ds ckn ;g ns[kk tkrk gS fd muesa ls ,d ikl jksfx;ksa dh HkhM+ yxh jgrh gS] tcfd nwljs ds ikl mipkj gsrq dksbZ tkuk ilan ugha djrk gSA O;kogkfjd thou esa ,slk ,d ugha vfirq dbZ mnkgj.k ns[kus dks feyrs gSaA ,slk D;ksa gksrk gS\ fo”ys’k.k djus ij ge ikrs gSa fd ltZu ds :i esa ,d O;fDr lQyrk ds f”k[kj ij gksrk gS] D;ksafd og miyC/k 24 ?kaVksa esa vius ikfjokfjd o O;fDrxr nkf;Roksa dk fuokZg djrs gq, Hkh ;FkklaHko viuk vf/kdre le; vkSj /;ku jksx dh izÑfr dks le>rs gq, mlds funku ds fy, nsrk gSA blds Bhd foijhr] nwljk O;fDr viuk le; “kY; fpfdRlk ds ctk; vU; dk;ks± esa O;rhr djuk अधिक ilan djrk gSA Li’V gS fd vU; ckrsa leku gksrs gq, Hkh] ,d ltZu ds :i esa og O;fDr vf/kd lQy gksxk tks कुशल समय-प्रबंधन से jksxh ds jksx&funku,व  mipkj  dks izkFkfedrk देते हुए अपने क्षेत्र में हो रही नवीनतम खोजों की जानकारी रखता है।

izÑfr gesa  प्रतिदिन 24 ?kaVs  काs le; iznku djus ds lkFk gh mlds mi;ksx dh Lora=rk Hkh nsrh gSA pkgs ge 24 घंटों के ml le; को O;FkZ ds dkeksa esa O;rhr djsa ;k mldk jpukRed mi;ksx djsa] izÑfr fdlh dks dqN ugha dgrh gS vkSj vxys fnu fQj jk’Vªifr ls ysdj pijklh rd] lHkh dks fcuk fdlh HksnHkko ds 24 ?kaVs dk le; miyC/k djk nsrh gS vkSj ;g Øe tUe ls e`R;qi;±r vuojr pyrk jgrk gSA जहां तक भाग्य की भूमिका का प्रश्न है, भाग्य भी तभी कार्य करता है जब व्यक्ति स्वयं उद्यम करे:   

m|esu fg fl/;fUr dk;kZf.k u euksjFkS%A
u fg lqIrL; flagL; izfo”kfUr eq[ks e`xk%AA

fgrksins”k ds mDr “yksd esa dgk x;k gS fd m|e ls gh dk;Z  सिद्ध होते हैं क्योंकि lksrs gq, flag ds eq[k esa fgj.k vius vki ugha tkrk gSA LokHkkfod gS fd भाग्य एवं m|e dk iw.kZ ykHk ysus ds fy, le;&izca/ku mi;ksxh fl) gksrk gSA ;g O;fDr ij fuHkZj djrk gS fd वह भाग्य पर भरोसा करते हुए सोता रहे या izkIr le; में  lkFkZd iz;kl dj viuk thou laokj ysA oLrqr% HkkX; o m|e ¼iq:’kkFkZ½ ds fojks/kkHkkl dks nwj djus esa le;&izca/ku ,d lsrq dk dke djrk gSA izÑfr esa gj Lora=rk ds lkFk ,d vfyf[kr nkf;Ro Hkh tqM+k gqvk gksrk gSA le; ds jpukRed lnqi;ksx ds ckjs esa nkf;Ro cks/k O;fDr dks Lo;a fodflr djuk gksrk gSA

समय की परिभाषा व महत्व को समझने के पश्चात प्रश्न आता है कि समय का प्रबंधन कैसे किया जाए? कुशल प्रबंधन के पांच मूल तत्व होते हैं – आयोजना, संगठन, नेतृत्व, समन्वय और नियंत्रण। इन्हें व्यवहार में अपना कर समय-प्रबंधन किया जा सकता है।
आयोजना के अंतर्गत हमें अपने कार्यों की प्राथमिकता के आधार पर दैनिक, साप्ताहिक, मासिक और वार्षिक समय योजना बनानी होती है।
संगठन के अंतर्गत हमें अपने कार्यों को समयबद्ध रूप से पूरा करने के लिए आवश्यक संसाधनों का प्रबंधन करना होता है।
नेतृत्व के अंतर्गत हमें कार्यों का आवंटन संबंधित व्यक्तियों को करना होता है क्योंकि सारे कार्य एक व्यक्ति नहीं कर सकता है।
समन्वय और नियंत्रण के द्वारा योजनाओं को क्रियांवित करने में मदद मिलती है।   समन्वय और नियंत्रण के अभाव में अच्छी से अच्छी कार्य योजनाएं भी विफल हो जाती हैं और कार्य समय पर पूर्ण नहीं होते हैं।
प्रबंधन के उक्त पांच तत्वों के आधार पर समय-प्रबंधन की कुछ उपयोगी टिप्स निम्नलिखित हैं:
·         संप्रेषण में स्पष्टता रखें।
·         समय-समय पर समीक्षा करें कि आप अपने समय का उपयोग किस प्रकार कर रहे हैं।
·         जिन कार्यों में व्यर्थ समय व्यतीत होता है उन्हें पहचान कर उन पर प्रभावी नियंत्रण रखें – जैसे कि गपशप, कार्य को टालने की प्रवृत्ति, व्यर्थ के व्यवधान इत्यादि।
·         धन के बजट की तरह समय के उपयोग का भी बजट बनाएं।
·         कागजी कार्य को कम करें, इसका अनावश्यक विस्तार नहीं करें।
·         कम समय में अधिक कार्य करने के लिए सूचना प्रौद्योगिकी के साधनों का उपयोग करें, जैसे कि कंप्यूटर, ईमैल, एस एम एस इत्यादि।
·         औसत रूप से प्रतिदिन के 24 घंटों में से हम 8 घंटे सोने में, 8 घंटे अपने व्यावसायिक कार्य में, 2 घंटे भोजन पर, 2 घंटे संप्रेषण में और 1 घंटा नहाने-धोने व तैयार होने में व्यतीत करते हैं। हमारी दिनचर्या के लिए आवश्यक  इन 21 घंटों के पश्चात हमारे पास 3 घंटे बचते हैं जिनके रचनात्मक उपयोग पर हमारे जीवन की प्रगति और क्वालिटी निर्भर करती है।       

वस्तुतः, हर व्यक्ति अपने अनुभव से जानता है कि अपने कार्यों में वह समय-प्रबंधन कैसे करे। ऊपर से, समय-प्रबंधन बहुत ही सरल कार्य लगता है और हम सभी में यह प्रवृत्ति होती है कि वह अपने से छोटों को समय का सदुपयोग करने की सलाह देते रहते हैं।  किंतु स्वयं के मामले में इच्छा-शक्ति के अभाव के कारण स्वयं के समय-प्रबंधन में विफल रहते  हैं। अतः आवश्यकता है कि हम आत्म-अनुशासन द्वारा अपने कार्य समय पर करने की जीवन शैली विकसित करें।   
 (नोट: यह लेख दिनांक 18 दिसंबर 2012 को लिखा गया था)

सोमवार, 25 अप्रैल 2016

सब चलता है

सब चलता है

"सब चलता है" वाली मानसिकता जीवन के हर क्षेत्र में हमारी राष्ट्रीय कमजोरी बन चुकी है| 
सवाल यह है कि यह मानसिकता बदले कैसे? 
यह वास्तव में यक्ष प्रश्न है
पहले हमें आशा थी कि नई पीढ़ी हालात बदलेगी
लेकिन समाज के हर वर्ग में येन केन प्रकारेण सब कुछ तुरंत हासिल करने की 
बढ़ती प्रवृत्ति को देखते हुए हालात बदलने की सारी आशाएं धूमिल होती जा रही हैं
ऐसी निराशाजनक स्थिति में प्रकृति स्वतःअपना कार्य करेगी 
या फिर यदा-यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवती...का 
शाश्वत सिद्धांत कार्य करेगा
हालात तो हर हाल में बदलेंगे
यदि हम स्वयं नहीं बदलेंगे तो प्रकृति अपने विध्वंसात्मक रूप में कार्य करेगी! 
ऐसी स्थिति मानव जाति के लिए घोर पीडादायक होगी 
पर यह युगांतरकारी परिवर्तन के लिए आवश्यक होगी|