शुक्रवार, 15 मई 2020

काला धन: कितना काला


काला धन: कितना काला?
                                                

                                                          - एस. एन. घाटिया
27 सितम्बर 2012 

हाल ही में भारत की जनता मूक दर्शक की तरह देखती रही कि कोयले की कलुष कालिमा और विषाक्त धुएं ने किस तरह भारतीय संसद के मानसून सत्र (2012) को पंगु बना कर रख दिया था. संसद के भीतर-बाहर राजनीतिक पार्टियों के आरोपों-प्रत्यारोपों नें सामान्य नागरिक के मन में संपूर्ण व्यवस्था के प्रति अविश्वास सुदृढ़ कर दिया है. उसे अब इस देश में अपने भविष्य की चिंता सताने लगी है. टीवी या अखबार खोलते समय यह दुश्चिंता रहती है कि आज कौन सा नया घोटाला उजागर होगा! अब टीवी चैनलों को पारिवारिक राग-द्वेष के घिसे-पिटे सीरियल दिखाने की जरूरत नहीं है. उन्हें बस इतना करना है कि अलग-अलग दलों के नेताओं को विभिन्न क्षेत्रों में व्याप्त घोटालों पर चर्चा करने के लिए एक मंच प्रदान कर दें और फिर देखिए कैसे वे एक-दूसरे के कार्यकाल में किए हुए घोटालों की परतें खोलते हैं.

भ्रष्टाचार और काले धन में पारस्परिक कार्य-कारण संबंध है. एक ओर, काले धन की उत्पत्ति का कारण देश में व्याप्त भ्रष्टाचार है तो दूसरी ओर काले धन के कारण भ्रष्टाचार बढ़ रहा है, क्योंकि जिसके पास काला धन है वह उसके बल पर अपने जायज-नाजायज सभी कार्य कराने में समर्थ हैं. भ्रष्टाचार को शिष्टाचार के रूप में स्वीकार कर लिया गया है. भ्रष्टाचार और काले धन के इस दुष्चक्र से सामान्य नागरिक संत्रस्त है. हर कोई चाहता है कि भ्रष्टाचार व घोटालों में लिप्त लोगों को कड़ी-से-कड़ी सजा दी जाए, चाहे वे कितने ही प्रभावशाली या किसी भी राजनीतिक दल से क्यों न हो. विभिन्न मंचों से यह मांग भी उठ रही है कि विदेशों में जमा काले धन को वापस लाया जाए, जिससे देश के आर्थिक विकास को गति मिल सके. भ्रष्टाचार और काले धन के विरुद्ध कई सरकारी/गैर-सरकारी संस्थाएं कार्यरत हैं और कई विशाल जन-आंदोलन भी आयोजित किए जा चुके हैं. सिद्धांततः और घोषित रूप से, सरकार के तीनों अंग – विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका - भी भ्रष्टाचार और काले धन के विरुद्ध है और इनके उन्मूलन व रोकथाम के लिए कई कानून व नियम भी बने हुए हैं.

भ्रष्टाचार पर अंकुश हेतु लोकपाल की नियुक्ति के मुद्दे पर अगस्त 2011 में साफ-सुथरी छवि वाले समाजसेवी अन्ना हज़ारे के नेतृत्व में चलाए गए आन्दोलन से देश में एक नवीन आशा का संचार हुआ था. इस आन्दोलन को आशातीत जन-समर्थन मिला और सरकार चारों तरफ से घिर गई थी. India Against Corruption Civil Society जैसी स्वच्छ छवि वाली गैर-राजनीतिक संस्थाओं के तत्वाधान में भ्रष्टाचार और काले धन के सर्वव्यापी दैत्यों से मुक्ति मिलने की आशा बंधी थी. किंतु एक वर्ष में ही टीम अन्ना में मतभेद गहराते चले गए, आन्दोलन की सफलता के लिए राजनीतिक दल बनाने की बात होने लगी और जनहित पर व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं हावी होने लगी. सितंबर 2012 में अन्ना हज़ारे नें सार्वजनिक घोषणा कर दी कि टीम के सदस्यों द्वारा एक नई राजनीतिक पार्टी बना कर चुनाव लड़ने के प्रस्तावों से वे असहमत हैं. यह भी बताया गया कि अरविन्द केजरीवाल के एनजीओ इंडिया अगैंस्ट करप्शन को 1 अप्रैल 2011 से 30 सितंबर की अवधि में कुल रु.2.94 करोड़ का चंदा मिला था, जिसमे से रु.1.57 करोड़ आंदोलन पर खर्च हुए थे. संबंध विच्छेद हो जाने पर, अरविन्द केजरीवाल नें चंदे की शेष राशि लगभग रु.2.00 करोड़ का चेक अन्ना हज़ारे को देने की पेशकश की, किंतु अन्ना हज़ारे नें लेने से मना कर दिया.
  
हर स्तर पर हर संभव प्रयासों के बावजूद देश में काला धन दिन-दूना और रात-चौगुना होता जा रहा है. ऐसी स्थिति में कई प्रश्न उठ रहे हैं. क्या यह माना जाए कि भ्रष्टाचार और काले धन के उन्मूलन व रोकथाम के लिए  सरकार और जनता के स्तर पर किए जा रहे प्रयासों में संकल्प की शुद्धता और दृढ़ इच्छाशक्ति का अभाव है? क्या समस्या की भयानकता को समझते हुए इसके विभिन्न आयामों का सही विश्लेषण नहीं किया गया है? क्या रक्षक ही भक्षक बने हुए हैं? क्या अपराधी स्वयं ही अनुसंधानकर्ता की भूमिका निभा रहे हैं, जिससे समस्या बढ़ती जा रही है?
समस्या को समझने के लिए काले धन की व्याख्या करना आवश्यक है. इसकी परिभाषा में मुख्य रूप से दो प्रकार की आय सम्मलित की जाती है:
1.    आपराधिक व अवैधानिक गतिविधियों से अर्जित आय/धन.
2.    वैधानिक गतिविधियों से अर्जित ऐसी अघोषित आय/धन जिस पर लागू टैक्सों का भुगतान नहीं किया जाता है.
अघोषित धनार्जन के नए-नए तरीके विकसित होते जा रहे हैं, क्योंकि भ्रष्टाचार और काले धन की रोकथाम के लिए बनाया गया हर कानून/नियम काली कमाई का एक नया स्रोत बन जाता है. काली कमाई के वर्तमान प्रचलित मुख्य तरीकों की सूची निम्नलिखित है:

आपराधिक व अवैधानिक गतिविधियां:
1.       विभिन्न प्रकार की वित्तीय धोखाधड़ी
2.       नकली व प्रतिबंधित वस्तुओं का लेन-देन
3.       नशीले पदार्थों का निर्माण, व्यापार व तस्करी
4.       खनिज पदार्थों का अवैध खनन
5.       वनों की अवैध कटाई
6.       मादक द्रव्यों का अवैध व्यापार
7.       चोरी, डकैती व अपहरण
8.       वैश्यावृत्ति व यौन शोषण के लिए मानव तस्करी
9.       हथियारों की तस्करी
10.    सरकारी व गैर-सरकारी संस्थाओं के धन का गबन एवं वस्तुओं की  चोरी 
11.    राजकीय सेवाओं के माध्यम से अनुचित लाभ (जैसे कि विभिन्न सरकारी योजनाओं के अंतर्गत लाइसेंस-परमिट-लीज-ऋण-अनुदान प्रदान करना, नियम विरुद्ध भू-उपयोग परिवर्तन, अवैध निर्माण का नियमन, नियमों की अवहेलना/कार्य की प्रक्रिया को तेज करना इत्यादि) प्रदान करने की एवज में रिश्वत लेना व सार्वजनिक पद का दुरुपयोग करना.

वैधानिक गतिविधियों से अर्जित अघोषित आय/धन:
इस श्रेणी के अंतर्गत वे आर्थिक गतिविधियां आती हैं जो वैधानिक रूप से तो स्वीकृत होती हैं, जैसे कि फर्मों व कंपनियों द्वारा किए जाने वाले विभिन्न प्रकार के व्यापारिक व व्यावसायिक कार्य-कलाप. किंतु उनसे अर्जित आय व धन को पूर्ण या आंशिक रूप से छिपा कर उन पर देय विभिन्न टैक्सों जैसे कि आय कर, बिक्री कर/वैट, एक्साइज ड्यूटी, स्टाम्प ड्यूटी व अन्य वैधानिक दायित्वों का भुगतान नहीं करना. इस प्रकार की टैक्स चोरी के प्रचलित तरीके निम्नलिखित हैं:

1.    व्यापार-व्यवसाय के कोई बही-खाते नहीं रखना.
2.    विभिन्न सरकारी विभागों को प्रस्तुत करने के लिए एक ही व्यापार-व्यवसाय के अलग-अलग बही-खाते रखना.
3.    बिना बिल/रसीद के वस्तुओं और सेवाओं की खरीद व बिक्री.
4.    बेनामी संपत्तियों में निवेश करना.
5.    बिक्री/प्राप्तियों तथा खरीद की राशियों को बही-खातों में कम दर्ज करना.
6.    खर्चों को बढ़ा-चढ़ा कर दिखाना.
7.    बिक्री को सहयोगी संस्थानों के बही-खातों में दर्शाना.
8.    उत्पादन कम बताना.
9.    गलत कीमत दिखाना.
10.  बिक्री/प्राप्तियों को बढ़ा-चढ़ा कर दिखाना.
11.  विदेशी संस्थानों को बोगस खर्चों का भुगतान दिखाना.
12.  बोगस गिफ़्ट्स देना दिखाना.
13.  कंपनियों द्वारा भारी प्रीमियम पर शेयर जारी करना दिखाना.
14.  अचल संपत्तियों की कम कीमत दर्शाना, इत्यादि.
15.  आयकर-मुक्त कृषि आय को बढ़ा-चढ़ा कर बताना.
16.  एनजीओ के माध्यम से बोगस कार्य दिखा अनुदान/चंदा लेना.  

आर्थिक विश्लेषक देश में काले धन की मात्रा के बारे में एकमत नहीं हैं. अलग-अलग आकलनों के अनुसार काला धन देश के सकल घरेलू उत्पादन (GDP) का 20 से 45 प्रतिशत तक बताया जाता है. किंतु ये सभी आकलन तथ्यों पर आधारित नहीं हैं, क्योंकि काला धन ऐसी बेहिसाबी आय है जिसके बारे मे कहीं भी, किसी के पास कोई तथ्यात्मक जानकारी नहीं होती है. मई 2012 में भारत सरकार के तत्कालीन वित्तमंत्री श्री प्रणव मुखर्जी (जो कि अभी भारत के वर्तमान राष्ट्रपति हैं) द्वारा प्रस्तुत श्वेत पत्र में यह स्वीकार किया गया है कि काले धन के सृजन अथवा संचयन के लिए कोई विश्वस्त अनुमान नहीं है, और न ही ऐसे अनुमान के लिए कोई सर्वसहमत पद्धति है.

तथ्यात्मक जानकारी के अभाव में काला धन एक ऐसा विषय बन गया है जिसे विभिन्न पार्टियां और समूह अपने राजनीतिक दांव-पेंच के रूप में उछालते रहे हैं. हाल ही में बाबा रामदेव नें विदेशों में जमा काले धन को देश में लाने के लिए फिर आन्दोलन छेड़ा है. मीडिया व आन्दोलनकर्ता काले धन के मुद्दे को सनसनीखेज बनाने के लिए आंकड़ों को बढ़ा-चढ़ा कर बताने का कोई अवसर नहीं छोड़ते हैं. ऐसा ही अतिशयोक्तिपूर्ण दावा गत वर्ष बाबा रामदेव नें किया था जब उन्होनें कहा कि काले धन की राशि भारतीय अर्थव्यवस्था के आकार से सात गुना अधिक है और इस राशि की वसूली होने पर भारतीय रुपए की कीमत 50 अमेरिकी डॉलर के बराबर हो जाएगी.
टीम अन्ना में गंभीर मतभेदों के सार्वजनिक होने के पश्चात, सामान्य नागरिक अब इस प्रकार के आन्दोलनों में सक्रिय होने से कतरा रहा है. जनहित के नाम पर व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए चलाए जाने वाले ऐसे अभियानों की विश्वसनीयता भी राजनीतिक पार्टियों की तरह संदेह के घेरे में आ गई है. टीम अन्ना के बिखराव से, अब यह स्पष्ट होता जा रहा है कि लोगों के इस आन्दोलन से जुड़ने के मूल में निस्वार्थ सेवा/त्याग की भावना कम व व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं अधिक प्रबल रही थी.
भ्रष्टाचार की परिभाषा का दायरा व्यक्ति की नैतिक मान्यताओं पर आधारित होता है. हमारे देश में ऐसे भी लोकसेवक का आदर्श उदाहरण है जो सरकारी कार्य करते समय सरकारी लैंप जलाते थे और व्यक्तिगत कार्य करते समय अपना स्वयं के लैंप का उपयोग करते थे. इसके ठीक विपरीत, वर्तमान युग में अधिकारियों के आवासीय विद्युत व्यय का भुगतान सरकारी कार्यालय के मीटर से करने में कोई हिचक अनुभव नहीं की जाती है. टीम अन्ना की एक प्रमुख सदस्य किरन बेदी अपने यात्रा व्यय का पुनर्भुगतान बढ़ा-चढ़ा कर लेना इसलिए उचित समझती हैं कि वे ऐसा अपने एनजीओ के माध्यम से समाज के बृहत्तर हित में कर रही थी. उनके मतानुसार ऐसा करने में कुछ भी अनैतिक नहीं था. किंतु यह प्रकरण सार्वजनिक होने पर इस तथाकथित उचित राशि को लौटा भी देती हैं. कोई आश्चर्य नहीं कि सरकारी कार्यों में अरबों-करोड़ों रुपयों के घोटाले जब सहज और नियमित रूप से होने लगे हैं तो यात्रा-व्यय जैसी इस प्रकार की छोटी-मोटी अनियमितताओं पर आपत्ति करना भी बेमानी हो जाता है ! भारत सरकार के श्वेत पत्र में उल्लेखित अघोषित आय/धन के लिए अपनाए जाने वाले तरीकों की सूची से स्पष्ट है कि हम में से अधिकांश लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से किसी-न-किसी स्टैज पर काले धन की निर्माण प्रक्रिया में लिप्त हैं. एक अनुमान के अनुसार आपराधिक/अवैधानिक गतिविधियों की तुलना में वैधानिक गतिविधियों से अर्जित काले धन की मात्रा अधिक है. वैधानिक गतिविधियों से प्राप्त आय को पूर्ण या आंशिक रूप से नहीं दिखाने में देश के कॉर्पोरेट घरानों से लेकर सभी वर्गों, विशेष रूप से प्रभावशाली व शिक्षित वर्ग, के नागरिक लिप्त हैं.
उक्त दोनो श्रेणियों की गतिविधियों के मूल में धन के प्रति लोभ-लालच की मानवीय प्रवृत्ति होती है जिसे प्रशासनिक ढिलाई से प्रोत्साहन मिलता है. काले धन के उन्मूलन को लेकर चिंतित हर कोई है, किंतु फिर भी समस्या लगातार जटिल होती जा रही है. इसका कारण है कि मानव जाति के इतिहास में समृद्धि और अपराध (भ्रष्ट आचरण) के तार आदिकाल से जुड़े रहे हैं. हर सभ्य समाज में संपत्ति के अधिकार को स्वीकृति दी गई है. हमारे देश की संविधान सभा नें भी संपत्ति के अधिकार को व्यक्ति का मौलिक अधिकार माना था. संपत्ति के प्रति मानव मन की अदम्य लालसा एक ओर “Right to property” जैसी वैधानिक स्वीकृतियों से सुदृढ़ होती हैं तो दूसरी ओर जिसकी लाठी उसकी भैंस (Might is right) तथा चोरी का गुड़ मीठा होता है (Forbidden fruits are sweet) जैसी लोकोक्तियों में प्रतिबिंबित होती है. कोई आश्चर्य नहीं कि अर्थ-प्रधान सामाजिक वातावरण व्यक्ति को भ्रष्ट आचरण के लिए प्रोत्साहित करता है. समृद्धि और अपराध (भ्रष्ट आचरण) के संयुक्त तारों के सन्दर्भ में यहां पौराणिक पक्ष की ओर इंगित करना भी प्रासंगिक रहेगा. धन-संपत्ति की देवी लक्ष्मी की पूजा-अर्चना का विधान कार्तिक कृष्ण पक्ष की अमावस्या की काली रात में कर हमने प्रतीकात्मक रूप से धन के श्याम वर्ण को आदि काल से ही पौराणिक स्वीकृति प्रदान कर रखी है. इतना ही नहीं, देवी लक्ष्मी के वाहन (carrier) के रूप में उल्लू को चिन्हित किया हुआ है जो कि रात्रि के अंधेरे में अपनी गतिविधियों के संचालन के लिए जाना जाता है.
इस पृष्ठभूमि में, काले धन की बहुलता एक संयोग मात्र नहीं है, बल्कि इसके लिए पीढ़ी-दर-पीढ़ी सायास प्रयत्न किए जाते रहे हैं. यही कारण है कि भारत के संवैधानिक गणतंत्र में अब ग्राम पंचायत से संसद तक वंश-परंपरा सुदृढ़ रूप से स्थापित हो चुकी है. निर्धारित योग्यता रखते हुए भी आम आदमी के लिए किसी चुनाव में निर्वाचित हो पाना टेढ़ी खीर है. धन-बल व बाहु-बल चुनाव में निर्वाचित होने की आवश्यक शर्त बन गए हैं. स्थितियां यहां तक खराब हो चुकी है कि सामाजिक संस्थाओं के पदाधिकारियों के चुनाव भी काले धन के बल पर लड़े जाते हैं. अब चुनाव समाज सेवा के लिए नहीं लड़े जाते हैं बल्कि यह एक प्रकार का निवेश माना जाने लगा है जिसके माध्यम से व्यक्ति को कई गुना धन अर्जित करने के अवसर प्राप्त होते हैं. वर्तमान राजनीतिक वातावरण में किसी भी स्तर का चुनाव लड़ने और जीतने के लिए जितना धन चाहिए वह काली कमाई से ही संभव है. यह एक खुला रहस्य है कि सभी राजनीतिक दल चुनाव लड़ने के लिए चंदा लेते हैं और सरकार बनने के बाद चंदा देने वालों की चांदी होती है.              
वर्ष 2012 में जिस गति से भारी राशियों के घोटाले सामने आये हैं, उससे ऐसा प्रतीत होना स्वाभाविक है कि अब देश में भ्रष्टाचार बेलगाम होता जा रहा है. तुलना के लिए लोग प्राय: कहते हैं कि – पहले तो कभी इतने घोटाले नहीं होते थे; देश में भ्रष्टाचार था पर आटे में नमक की तरह इत्यादि, इत्यादि. इस प्रकार के कथन तथ्यपरक नहीं हैं. भ्रष्टाचार पहले भी था और किसी भी मापदंड से उसका तुलनात्मक प्रतिशत कम नहीं था. अंतर केवल इतना है कि सरकारी कामकाज में पहले इतनी पारदर्शिता नहीं थी जो सूचना के अधिकार और कंप्यूटरीकरण के कारण अब है. पहले जनता को घोटालों का पता नहीं चलता था और वे दबा दिए जाते थे. अब सूचना के अधिकार, इंटरनेट, टीवी चैनलों व मीडिया की सक्रियता के कारण कोई भी जानकारी कुछ ही क्षणों में पूरे देश में सार्वजनिक हो जाती है. विकीपीडिया पर भारत में घोटालों की सूची शीर्षक के अंतर्गत स्वतंत्रता से अब तक के सभी घोटालों को संकलित किया गया है. विगत एक दशक में सरकार के तीनों अंगों – विधायिका, कार्यपालिका व न्यायपालिका – के बीच एक-दूसरे की कमियों को सार्वजनिक करने की प्रतियोगिता होने लगी है. एक सीमा के पश्चात ऐसा अंतर्कलह लोकतंत्र के लिए घातक सिद्ध हो सकता है. किंतु इसके कारण सरकारी कामकाज में हो रही अनियमिततायें व घोटाले जनता के सामने आ रहे हैं और चाहे-अनचाहे उन पर कार्यवाही भी करनी पड़ रही है. सार्वजनिक जीवन में स्वच्छता और पारदर्शिता के लिए यह एक अच्छा संकेत है और इसका निवारक प्रभाव (Deterrent Effect) होता है.

कई स्वतंत्र विश्लेषक मानते हैं कि आर्थिक सुधारों और संचार क्रांति के पश्चात काले धन के अनुपात में कमी हुई है. टर्की के बॉगैज़िकी विश्वविद्यालय के दो शोधकर्ताओं Ceyhun Elgin और Oguz Oztunali  नें ब्रिक्स देशों (ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और साउथ अफ़्रीका) में 1950 से 2008 के दौरान  काले धन की तुलनात्मक स्थिति के अध्ययन में पाया कि 1950 में भारत में काला धन सकल घरेलू उत्पादन (जीडीपी) का 40 प्रतिशत था जो कि 2008 में घट कर 23.71 प्रतिशत रह गया है. इस चार्ट के अनुसार काले धन को कम करने में भारत, केवल चीन को छोड़ कर, ब्रिक्स समूह (BRICS Group) के शेष अन्य देशों की तुलना में अधिक सफल रहा है. यहां यह स्पष्ट करना भी आवश्यक है कि काले धन का प्रतिशत चाहे कम हो गया हो, किंतु सकल घरेलू उत्पादन (जीडीपी) में कई गुना वृद्धि होने से काले धन की कुल राशि भी निरंतर बढ़ती जा रही है. 

किंतु जैसा कि पहले कहा जा चुका है, मात्र आंकड़ों के विवेचन से समस्या हल नहीं होने वाली है. कई अध्ययनों से व व्यावहारिक स्तर पर भी यह निर्विवाद रूप से स्पष्ट हो चुका है कि भ्रष्टाचार और काले धन के मूल में सामाजिक और मनोवैज्ञानिक कारण होते हैं. जब किसी देश में चरित्र के दोहरेपन को सामाजिक स्वीकृति मिल जाती है तो नियमों का उल्लंघन कर येन केन प्रकारेण धन अर्जित करने की प्रवृत्ति को खुली छूट मिल जाती है. भौतिकतावाद की दौड़ में धन का महत्व बढ़ने के साथ ही आदर्शों और नैतिक मूल्यों का ह्रास आरंभ हो जाता है. व्यक्ति सार्वजनिक मंच पर क्या कहता है और व्यक्तिगत जीवन में क्या आचरण करता है, इन दोनों स्थितियों में जब तक विरोधाभास रहेगा, आम आदमी को काले धन की समानांतर अर्थव्यवस्था में जिसकी लाठी उसकी भैंस जैसी त्रासदी में जीना पड़ेगा. क्या इस त्रासदी से बाहर निकलने का कोई उपाय है? इसका उत्तर इस यक्ष प्रश्न में निहित है – क्या हम लोग व्यक्तिगत स्तर पर व्यवहार के दोहरेपन को छोड़ने के लिए तैयार हैं?  

 (लेखक बैंकिंग-वित्तीय विशेषज्ञ एवं स्वतंत्र लेखक है. यह लेख 27 09 2012 को लिखा गया था.)     
                                                     
        
इस वर्ष  इस Annex of Swiss Banks - All Countries





  
       


समय प्रबंधन


समय प्रबंधन 

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18 दिसंबर 2012
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le; izca/ku dk iwjk ykHk ysus ds fy, ;g  समझना vko”;d gS fd le; D;k gS vkSj bldk izca/ku dSls fd;k tkk ldrk gSA tSlk कि ge tkurs gSa tUe vkSj e`R;q ij O;fDr dk fu;a=.k ugha gksrk gSA vr% O;kogkfjd ifjHkk’kk dh n`f’V ls lalkj esa tUe vkSj e`R;q ds chp dh vof/k dks O;fDr fo”ks’k ds fy, miyC/k le; dgk tk ldrk gSA दूसरे शब्दों में, हमारा समय जन्म से शुरू होता है और मृत्यु के साथ समाप्त हो जाता है। ;gh og vof/k gS ftlesa O;fDr le;&izca/ku ds माध्यम से  vius सजग प्रयास से thou esa lQyrk vkSj vkuan izkIr dj ldrk gSA प्रायः ge ns[krs gSa fd जीवन में leku volj feyus ij Hkh ,d gh {ks= esa nks O;fDr;ksa dk dSfj;j cgqr fHkUu gks ldrk gSA mnkgj.k ds fy,] ,d gh esfMdy dkWyst ls nks fo|kFkhZ ltZjh dh f”k{kk izkIr djrs gSaA nksuksa us ,d gh dkWyst esa v/;;u fd;k] nksuksa dks i<+kus okys v/;kid Hkh ,d gh Fks] nksuksa us iqLrdsa Hkh ogh i<+h] ,d gh lkFk okMks± esa izf”k{k.k fy;k] ,d gh Js.kh esa ijh{kk,a mÙkh.kZ dh] ,d gh vLirky esa ltZu ds in ij fu;qDr gq,] nksuksa ds dk;Z dk {ks= o le; ,d gh Fkk vkSj ikfjokfjd i`’BHkwfe Hkh yxHkx ,d tSlh gh jghA fdarq ltZu ds :i esa dqN o’kZ dh izsfDVl ds ckn ;g ns[kk tkrk gS fd muesa ls ,d ikl jksfx;ksa dh HkhM+ yxh jgrh gS] tcfd nwljs ds ikl mipkj gsrq dksbZ tkuk ilan ugha djrk gSA O;kogkfjd thou esa ,slk ,d ugha vfirq dbZ mnkgj.k ns[kus dks feyrs gSaA ,slk D;ksa gksrk gS\ fo”ys’k.k djus ij ge ikrs gSa fd ltZu ds :i esa ,d O;fDr lQyrk ds f”k[kj ij gksrk gS] D;ksafd og miyC/k 24 ?kaVksa esa vius ikfjokfjd o O;fDrxr nkf;Roksa dk fuokZg djrs gq, Hkh ;FkklaHko viuk vf/kdre le; vkSj /;ku jksx dh izÑfr dks le>rs gq, mlds funku ds fy, nsrk gSA blds Bhd foijhr] nwljk O;fDr viuk le; “kY; fpfdRlk ds ctk; vU; dk;ks± esa O;rhr djuk अधिक ilan djrk gSA Li’V gS fd vU; ckrsa leku gksrs gq, Hkh] ,d ltZu ds :i esa og O;fDr vf/kd lQy gksxk tks कुशल समय-प्रबंधन से jksxh ds jksx&funku,व  mipkj  dks izkFkfedrk देते हुए अपने क्षेत्र में हो रही नवीनतम खोजों की जानकारी रखता है।

izÑfr gesa  प्रतिदिन 24 ?kaVs  काs le; iznku djus ds lkFk gh mlds mi;ksx dh Lora=rk Hkh nsrh gSA pkgs ge 24 घंटों के ml le; को O;FkZ ds dkeksa esa O;rhr djsa ;k mldk jpukRed mi;ksx djsa] izÑfr fdlh dks dqN ugha dgrh gS vkSj vxys fnu fQj jk’Vªifr ls ysdj pijklh rd] lHkh dks fcuk fdlh HksnHkko ds 24 ?kaVs dk le; miyC/k djk nsrh gS vkSj ;g Øe tUe ls e`R;qi;±r vuojr pyrk jgrk gSA जहां तक भाग्य की भूमिका का प्रश्न है, भाग्य भी तभी कार्य करता है जब व्यक्ति स्वयं उद्यम करे:   

m|esu fg fl/;fUr dk;kZf.k u euksjFkS%A
u fg lqIrL; flagL; izfo”kfUr eq[ks e`xk%AA

fgrksins”k ds mDr “yksd esa dgk x;k gS fd m|e ls gh dk;Z  सिद्ध होते हैं क्योंकि lksrs gq, flag ds eq[k esa fgj.k vius vki ugha tkrk gSA LokHkkfod gS fd भाग्य एवं m|e dk iw.kZ ykHk ysus ds fy, le;&izca/ku mi;ksxh fl) gksrk gSA ;g O;fDr ij fuHkZj djrk gS fd वह भाग्य पर भरोसा करते हुए सोता रहे या izkIr le; में  lkFkZd iz;kl dj viuk thou laokj ysA oLrqr% HkkX; o m|e ¼iq:’kkFkZ½ ds fojks/kkHkkl dks nwj djus esa le;&izca/ku ,d lsrq dk dke djrk gSA izÑfr esa gj Lora=rk ds lkFk ,d vfyf[kr nkf;Ro Hkh tqM+k gqvk gksrk gSA le; ds jpukRed lnqi;ksx ds ckjs esa nkf;Ro cks/k O;fDr dks Lo;a fodflr djuk gksrk gSA

समय की परिभाषा व महत्व को समझने के पश्चात प्रश्न आता है कि समय का प्रबंधन कैसे किया जाए? कुशल प्रबंधन के पांच मूल तत्व होते हैं – आयोजना, संगठन, नेतृत्व, समन्वय और नियंत्रण। इन्हें व्यवहार में अपना कर समय-प्रबंधन किया जा सकता है।
आयोजना के अंतर्गत हमें अपने कार्यों की प्राथमिकता के आधार पर दैनिक, साप्ताहिक, मासिक और वार्षिक समय योजना बनानी होती है।
संगठन के अंतर्गत हमें अपने कार्यों को समयबद्ध रूप से पूरा करने के लिए आवश्यक संसाधनों का प्रबंधन करना होता है।
नेतृत्व के अंतर्गत हमें कार्यों का आवंटन संबंधित व्यक्तियों को करना होता है क्योंकि सारे कार्य एक व्यक्ति नहीं कर सकता है।
समन्वय और नियंत्रण के द्वारा योजनाओं को क्रियांवित करने में मदद मिलती है।   समन्वय और नियंत्रण के अभाव में अच्छी से अच्छी कार्य योजनाएं भी विफल हो जाती हैं और कार्य समय पर पूर्ण नहीं होते हैं।
प्रबंधन के उक्त पांच तत्वों के आधार पर समय-प्रबंधन की कुछ उपयोगी टिप्स निम्नलिखित हैं:
·         संप्रेषण में स्पष्टता रखें।
·         समय-समय पर समीक्षा करें कि आप अपने समय का उपयोग किस प्रकार कर रहे हैं।
·         जिन कार्यों में व्यर्थ समय व्यतीत होता है उन्हें पहचान कर उन पर प्रभावी नियंत्रण रखें – जैसे कि गपशप, कार्य को टालने की प्रवृत्ति, व्यर्थ के व्यवधान इत्यादि।
·         धन के बजट की तरह समय के उपयोग का भी बजट बनाएं।
·         कागजी कार्य को कम करें, इसका अनावश्यक विस्तार नहीं करें।
·         कम समय में अधिक कार्य करने के लिए सूचना प्रौद्योगिकी के साधनों का उपयोग करें, जैसे कि कंप्यूटर, ईमैल, एस एम एस इत्यादि।
·         औसत रूप से प्रतिदिन के 24 घंटों में से हम 8 घंटे सोने में, 8 घंटे अपने व्यावसायिक कार्य में, 2 घंटे भोजन पर, 2 घंटे संप्रेषण में और 1 घंटा नहाने-धोने व तैयार होने में व्यतीत करते हैं। हमारी दिनचर्या के लिए आवश्यक  इन 21 घंटों के पश्चात हमारे पास 3 घंटे बचते हैं जिनके रचनात्मक उपयोग पर हमारे जीवन की प्रगति और क्वालिटी निर्भर करती है।       

वस्तुतः, हर व्यक्ति अपने अनुभव से जानता है कि अपने कार्यों में वह समय-प्रबंधन कैसे करे। ऊपर से, समय-प्रबंधन बहुत ही सरल कार्य लगता है और हम सभी में यह प्रवृत्ति होती है कि वह अपने से छोटों को समय का सदुपयोग करने की सलाह देते रहते हैं।  किंतु स्वयं के मामले में इच्छा-शक्ति के अभाव के कारण स्वयं के समय-प्रबंधन में विफल रहते  हैं। अतः आवश्यकता है कि हम आत्म-अनुशासन द्वारा अपने कार्य समय पर करने की जीवन शैली विकसित करें।   
 (नोट: यह लेख दिनांक 18 दिसंबर 2012 को लिखा गया था)

सोमवार, 25 अप्रैल 2016

सब चलता है

सब चलता है

"सब चलता है" वाली मानसिकता जीवन के हर क्षेत्र में हमारी राष्ट्रीय कमजोरी बन चुकी है| 
सवाल यह है कि यह मानसिकता बदले कैसे? 
यह वास्तव में यक्ष प्रश्न है
पहले हमें आशा थी कि नई पीढ़ी हालात बदलेगी
लेकिन समाज के हर वर्ग में येन केन प्रकारेण सब कुछ तुरंत हासिल करने की 
बढ़ती प्रवृत्ति को देखते हुए हालात बदलने की सारी आशाएं धूमिल होती जा रही हैं
ऐसी निराशाजनक स्थिति में प्रकृति स्वतःअपना कार्य करेगी 
या फिर यदा-यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवती...का 
शाश्वत सिद्धांत कार्य करेगा
हालात तो हर हाल में बदलेंगे
यदि हम स्वयं नहीं बदलेंगे तो प्रकृति अपने विध्वंसात्मक रूप में कार्य करेगी! 
ऐसी स्थिति मानव जाति के लिए घोर पीडादायक होगी 
पर यह युगांतरकारी परिवर्तन के लिए आवश्यक होगी|

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2011

कोटा का विकास

कोटा का विकास – समस्याएं और समाधान


                                                                                                                              - एस एन घाटिया



जब हम विकास की बात करते हैं तो सिद्धांत रूप में यह बात उभर कर सामने आती है कि विकास समस्या और समाधान की एक शाश्वत प्रक्रिया है. कोई समस्या सामने आती है और मानव मस्तिष्क प्रयास कर उसका हल खोज लेता है. लेकिन उस समाधान के परिणामस्वरूप कोई नई समस्या उत्पन्न होती है और फिर उसका समाधान खोजा जाता है. इस प्रकार समस्या और समाधान की यह प्रक्रिया शाश्वत काल से चली आ रही है. इसी सिद्धांत को ले कर सामान्य भाषा में एक कहावत भी प्रचलित है कि आवश्यकता आविष्कार की जननी है. हम कह सकते हैं कि विकास मानव स्वभाव की एक मूल प्रवृत्ति है. मनुष्य कभी भी अपनी वर्तमान स्थिति से संतुष्ट नहीं होता है और वह प्रगति की नई राह खोजता रहता है. यही कारण है कि बौद्धिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अन्य प्राणियों की तुलना में मानव क्रमिक विकास के पथ पर सदैव अग्रसर रहा है और आज वह निर्विवाद रूप से सृष्टि की सर्वश्रेष्ठ कृति है.

वस्तुतः यथास्थिति से संतुष्ट नहीं रहने की प्रवृत्ति के कारण ही मानव जाति का उत्तरोत्तर विकास संभव हो सका है. समस्या और समाधान के इस कार्य-कारण संबंध से ही विकास और विनाश का अनन्य संबंध भी स्थापित होता है. ज़ब भी सुनामी या अन्य किसी विपदा से विनाश होता है तो मानव मन अपने स्वभाव के अनुरूप पुनः नव-निर्माण के प्रयास में जुट जाता है और तब तक चैन नहीं लेता है जब तक कि पहले से बेहतर स्थिति प्राप्त नहीं कर ले. साथ ही, यह भी सत्य है कि जब विकास चरम सीमा पर पहुंच जाता है तो विनाश की प्रक्रिया आरंभ हो जाती है. यही कारण है कि मानव जाति के इतिहास में कई सभ्यताओं का उत्थान और पतन हुआ. संक्षेप में, हम यह कह सकते हैं कि विनाश और विकास एक ही सिक्के के दो पहलू हैं और एक में दूसरे के बीज अंतर्निहित होते हैं.
विकास - किसकी जिम्मेदारी?

विकास की प्रक्रिया के इस सैद्धांतिक पक्ष को समझने के पश्चात यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि समस्याओं का समाधान खोजने का उत्तरदायित्व किसका है? उत्तर स्पष्ट है - प्रजातंत्र के रूप में हमने लोक-कल्याणकारी शासन (Welfare State) को स्वीकार किया है. इसलिए जन कल्याण की सभी समस्याओं के समाधान खोजने और उन्हें योजना के रूप क्रियांवित करने की जिम्मेदारी सरकार की है. चाहे समस्या बिजली, पानी, पेट्रोल, डीज़ल, सड़क, शिक्षा, चिकित्सा या रोज़गार की हो, हर चीज के लिए हम सरकार का मुंह जोहने के अभ्यस्त हो गए हैं. इसमें हमारी कोई गलती भी नहीं है क्योंकि हमें यही समझाया गया है कि सरकार बनाने के लिए आप हमें वोट दो और सरकार चलाने के लिए टैक्स दो. बस, फिर आपकी सभी समस्याओं को हल करने की जिम्मेदारी हमारी है. आज़ादी के बाद कुछ सालों तक तो यह व्यवस्था ठीक-ठाक चली क्योंकि सरकार के मन में भी ईमानदारी थी और जनता मे भी सहनशीलता थी कि नई-नई सरकार है, इसे अवसर दिया जाना चाहिए. किंतु यह हनीमून पीरियड ज्यादा नहीं चला. लगभग दो दशक बाद ही सरकारी नुमाइन्दे और कारिन्दे समझ गए कि सत्ता-सुख स्थायी नहीं है और फिर संपत्ति समेटने की जो होड़ चली वह आज जग-जाहिर है. आज स्थिति यह है कि टैक्स की आमदनी का अधिकांश भाग वेतन और प्रशासनिक खर्चों में चला जाता है. विकास के लिए पैसा बचता ही नहीं है. इसलिए सरकार द्वारा ऋण लिए जाते हैं, किंतु उसकी भी सीमा हम पार कर चुके हैं. अब विकास कैसे हो? इसके लिए एक नया कंसेप्ट चालू किया गया पी पी पी – पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप. विकास की योजनाएं इतनी विशाल हैं कि अकेली सरकार उन्हें नहीं चला सकती है. अतः विकास की प्रक्रिया में प्राइवेट सेक्टर की भागीदारी आवश्यक है. आज हम देखते हैं कि रैलवे के अलावा सरकारी एकाधिकार के लगभग सभी क्षेत्र धीरे-धीरे प्राइवेट सेक्टर के लिए खोल दिए गए हैं – शिक्षा, चिकित्सा, सड़कें, बिजली, पेट्रोल-डीज़ल, बैंकिंग-बीमा, डाक व फ़ोन सेवाएं इत्यादि. प्राइवेट सेक्टर के आने के बाद इन क्षेत्रों में प्रतियोगिता बढ़ी है और सेवाओं में सुधार देखने को मिला है.

विकास का मूल आधार क्या है? अब यह अच्छी तरह स्पष्ट हो चुका है कि विकास के लिए सरकारी संरक्षण का कोई अर्थ नहीं रह गया है. वनों के विकास के लिए हमने वन विभाग बनाया और वन समाप्त हो गए. सरकारी संरक्षण की यही कहानी हम चिकित्सा, शिक्षा, सड़कों, रोडवेज़ बसों, बिजली, पानी, डाक आदि क्षेत्रों के विकास में देखते हैं. किसी भी स्थान या क्षेत्र का विकास मूल रूप से दो बातों पर निर्भर करता है. प्रथम, वहां की भौगोलिक स्थिति, जलवायु और प्राकृतिक संसाधन जैसे नदियां, समुद्र, झीलें, भूमि का उपजाऊपन, खनिज पदार्थ इत्यादि. दूसरी, उसके नागरिकों की दृढ़ इच्छा शक्ति एवं नेतृत्व की योग्यता.

विकास की प्रक्रिया के इस परिप्रेक्ष्य में कोटा संभाग की स्थिति को समझने के लिए हमें कोटा के आर्थिक व व्यावसायिक इतिहास में जाना होगा. समय-समय पर यहां की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाले कारकों के आधार पर कोटा शहर को अलग-अलग नामों से पुकारा जाता रहा है.

नन्दग्राम
ललित कला अकादमी द्वारा प्रकाशित पुस्तक The Kingdom That Was Kota के अनुसार, सन 1719 में गोस्वामी गोपीनाथजी से वल्लभ कुल में दीक्षा लेने के पश्चात, महाराव भीमसिंह I नें आधिकारिक रूप से कोटा का नाम नंदग्राम कर दिया था. उस समय सरकारी पट्टों और परवानों (आदेशों) पर लगाई जाने वाली मोहर पर लिखा होता था:

उत्कीर्ण काया सर्वदा सर्वभाविणः भजनीयो प्रजाधिपः

भीमस्य कृष्ण दासस्य राजसिंह मध मुद्रिका

तत्पश्चात, सन 1744 में श्री मथुराधीशजी के मंदिर की स्थापना पाटनपोल में हुई. लगभग दो शताब्दियों तक इस मंदिर के कारण वैष्णवों के पुष्टिमार्गीय संप्रदाय का एक प्रमुख तीर्थस्थान बना रहा. यद्यपि यह नाथद्वारा या कांकरोली की तरह अधिक विकसित नहीं हो सका, पुष्टिमार्गीय संप्रदाय की श्रद्धा का केंद्र होने के कारण धार्मिक पर्यटन स्थल (नन्दग्राम) के रूप में भी कोटा की अर्थव्यवस्था को उस समय की परिस्थितियों के अनुरूप गति मिली.


दशहरा मेला

देश में मैसूर के बाद कोटा की ख्याति राष्ट्रीय स्तर के दशहरे मेले के कारण भी रही है. यद्यपि बदलते समय के साथ आज दशहरा मेला मनोरंजन का पर्याय रह गया है, किसी समय इस मेले का कोटा की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान हुआ करता था. इसका आरंभ एक धार्मिक मेले के रूप में सन 1723 में महाराव दुर्जनशाल सिंह द्वारा किया गया था. महाराव उम्मेद सिंह II (1889-1940) नें इस मेले का विस्तार कर इसे क्रय-विक्रय का केंद्र बना एक नया आर्थिक आयाम और अत्यधिक लोकप्रियता प्रदान की. कालांतर में इसे राष्ट्रीय मेले का दर्जा मिला.

सुगम भौगोलिक स्थिति, कृषि के लिए अनुकूल जलवायु और प्राकृतिक संसाधनों का लाभ कोटा को आरंभ से ही मिलता रहा है. ब्रिटिश शासन में दिल्ली-बंबई रैल मार्ग का निर्माण कोटा के आर्थिक विकास को सुदृढ़ता प्रदान करने में नींव का पत्थर साबित हुआ. इसके कारण कोटा की कृषि उपज और खनिज पदार्थों की पहचान देश-विदेश के बाज़ारों में हो गई. यही कारण है कि रैलवे लाइन के आसपास स्थानीय उद्योगों का विकास आरंभ हुआ.

स्वतंत्रता के पश्चात, 1948 में विलय के समय कोटा रियासत की वार्षिक आय लगभग रु. 1.25 करोड़ थी. तत्कालीन रियासत द्वारा नवनिर्मित राजस्थान प्रांत को अन्य परिसंपत्तियों के अलावा रु. 2.5 करोड़ नकद प्रदान किए गए थे.

स्वतंत्रता से पूर्व आधुनिक नागरिक सुविधाओं - नल, बिजली, शिक्षा, चिकित्सा व यातायात के साधन इत्यादि – की दृष्टि से कोटा रियासत की गिनती न केवल राजपूताने बल्कि पूरे भारत की गिनी-चुनी प्रगतिशील रियासतों में होती थी. महाराव उम्मेदसिंह II (1889-1940) के शासन काल में ही कोटा शहर में पहली बार नल-बिजली की सुविधा नागरिकों को उपलब्ध हो गई थी. सन 1909 में उच्च शिक्षा हेतु हाड़ोती का प्रथम हर्बर्ट हाईस्कूल (वर्तमान गवर्नमेंट कॉलेज) स्थापित किया जा चुका था जो कि 1956 में स्नातकोत्तर महाविद्यालय के रूप में क्रमोन्नत हो गया. इसी प्रकार लड़कियों की शिक्षा हेतु पहली बार 1916-17 में विद्यालय (वर्तमान जे डी बी गर्ल्स कॉलेज) की स्थापना की गई जो 1958 में स्नातक महाविद्यालय के रूप में क्रमोन्नत हो कर वर्तमान में स्नातकोत्तर स्तर का प्रमुख महाविद्यालय है. शिक्षा के क्षेत्र में इन प्रारंभिक प्रयासों का ही परिणाम है कि आज राजस्थान में साक्षरता की दृष्टि से कोटा का प्रथम स्थान (73.78%) है. 1940 के पश्चात, महाराव उम्मेदसिंह II के उत्तराधिकारी के रूप में महाराव भीमसिंह नें अपने पिता की प्रगतिशील नीतियों का अनुसरण करते हुए कोटा के विकास को जारी रखा. उनके समय में संचार साधनों के विस्तार पर विशेष ध्यान दिया गया और सीमेंट सड़कों का निर्माण कराया गया. इसी समय कोटा में एयरपोर्ट और महाराव भीमसिंह हॉस्पिटल का निर्माण हुआ.


कोटा स्टोन
व्यापार-व्यवसाय की दृष्टि से खाद्यान्नों, छत और फर्शी के लिए सैंड स्टोन (लाल पत्थर) और लाइम स्टोन (कोटा स्टोन) का देश के दूसरे भागों में भारी मात्रा में निर्यात आरंभ हुआ. लाखेरी में एसोसिएटेड सीमेंट कंपनी (एसीसी) की सीमेंट फैक्ट्री और रामगंजमंडी में एसोसिएटेड स्टोन कंपनी के चालू होने से स्थानीय अर्थव्यवस्था को गति मिली. लघु स्तर पर, जगपुरा में चूने के भट्टे और कैथून में कोटा साड़ी भी उल्लेखनीय हैं. यह उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पर कोटा की पहचान कोटा स्टोन और कोटा साड़ी के कारण भी रही है.

चंबल
एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन के रूप में चंबल नदी को कोटा की जीवन रेखा माना जाता है. स्वतंत्रता के आरंभिक वर्षों में चंबल घाटी परियोजना के अंतर्गत विभिन्न बांधों के निर्माण का कोटा के विकास में महत्वपूर्ण योगदान रहा है. चंबल कभी नहीं सूखने वाली नदी है. देश की प्रथम पंचवर्षीय योजना के अंतर्गत चंबल घाटी परियोजना का कार्य 1953 में आरंभ हो गया था और सिंचाई के लिए 1960 में नहरों से जल उपलब्ध करा दिया गया था. इस परियोजना के चार बांध तीन चरणों में बनाए गए थे. प्रथम चरण में, गांधी सागर डैम और कोटा बैराज का निर्माण 1960 में पूरा कर लिया गया था. द्वितीय चरण में, राणा प्रताप सागर बांध (रावतभाटा) 1970 में और तृतीय चरण में जवाहर सागर बांध 1972 में बन गए थे. लगभग एक दशक तक चंबल परियोजनाओं के विशाल निर्माण कार्यों के कारण कोटा की अर्थव्यवस्था को बल मिला. चंबल के नहरी जल की उपलब्धता से कोटा, बूंदी और बारां क्षेत्रों में विकास का एक नया युग आरंभ हुआ और कोटा चंबल के कारण भी जाना जाने लगा.

औद्योगिक नगरी
कोटा में जल और विद्युत की प्रचुरता के साथ ब्रॉडगेज रैल लाइन की उपलब्धता नें औद्योगिक समूहों को आकर्षित किया और इसी के साथ आरंभ हुआ आधुनिक बड़े उद्योगों की स्थापना का एक नया दौर. कुछ उल्लेखनीय नाम हैं - डीसीएम, जे के सिंथेटिक्स, ओरियंटल पॉवर कैबल्स, इंस्ट्रुमेंटेशन, रावतभाटा में एटोमिक पॉवर प्लांट, थर्मल प्लांट और मल्टीमेटल्स इत्यादि. इन उद्योगों की स्थापना के कारण कोटा एक औद्योगिक नगरी और राजस्थान के कानपुर के नाम से जाना लगा. इन बड़े उद्योगों की स्थापना के कारण जहां एक और कोटा के व्यापार-व्यवसाय और अनुषंगी लघु उद्योगों का विस्तार हुआ, वहीं दूसरी और बल्लभबाड़ी, बल्लभनगर, दादाबाड़ी और विज्ञाननगर जैसी बृहद नई आवासीय कालोनियों का निर्माण हुआ. आर्थिक विकास की दृष्टि से इसका लाभ सभी वर्गों को रोजगार, व्यापार और व्यवसाय के प्रचुर अवसरों के रूप में मिला.

कोटा में वर्तमान में कोई नियमित विमान सेवा नहीं है. विमान सेवा किसी भी शहर के विकास का एक मापदंड मानी जाती है. इस मापदंड पर हम कोटा को 1960 के दशक में अधिक विकसित कह सकते हैं क्योंकि उस समय यह विमान सेवा के माध्यम से दिल्ली, जयपुर इत्यादि शहरों से जुड़ा हुआ था.


औद्योगिक रुग्णता

राजनैतिक इतिहास की तरह, आर्थिक इतिहास में भी उत्थान और पतन का क्रम देखने को मिलता है. इन्हें तेजी और मंदी के आर्थिक चक्र कहते है. 1980 के दशक में श्रमिक आंदोलनों और अन्यान्य कारणों से कोटा में औद्योगिक रुग्णता का जो दौर आरंभ हुआ वह कोटा की अर्थव्यवस्था के लिए घातक सिद्ध हुआ. एक के बाद एक, लगभग सभी प्रमुख उद्योग रुग्ण होते गए. 1970 के दशक के पश्चात कोटा संभाग का विकास लगभग थम सा गया था. कोई नए उद्योग या विकास की सरकारी परियोजनाएं यहां नहीं आ रही थीं. कुछ विश्लेषक इसका एक मुख्य कारण इस संभाग को विरोधी राजनीतिक दल का गढ़ होना भी मानते हैं. जनमानस में यह एक सामान्य धारणा बन गई है कि प्रदेश का मुख्यमंत्री जिस क्षेत्र का होता है वहां का विकास अधिक होता है.

शैक्षणिक नगरी
जैसा कि कहा जाता है, जब विकास का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है तो कोई नई राह खुलती है. औद्योगिक रुग्णता के फलस्वरूप उत्पन्न आर्थिक मंदी से उबरने के लिए कोटा में कोचिंग संस्थाएं विकसित होने लगीं. व्यक्तिगत परिस्थितियों के कारण 1984 में श्री वी के बंसल द्वारा जे के कॉलोनी के एक गेरीज में शुरू की गई कोचिंग कक्षाएं आज एक विशाल उद्यम के रूप में विकसित हो चुकी हैं. सन 1986 में कोटा के एक कोचिंग छात्र को आइ आइ टी (I.I.T.) की प्रवेश परीक्षा में शीर्ष स्थान प्राप्त होने के बाद यहां कोचिंग उद्यम द्रुत गति से विकसित होने लगा. इंजीनियरिंग और मेडिकल इत्यादि की प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी के लिए इस समय बाहर के लगभग 70,000-80,000 छात्र अध्ययन करते हैं जिनका कोटा की अर्थव्यवस्था में लगभग रु.600 करोड़ वार्षिक का योगदान है. कोचिंग संस्थाओं नें इस व्यवसाय में लगभग रु.500 करोड़ का विनिवेश किया हुआ है. मोटे रूप से, कोचिंग छात्रों की वृद्धि दर लगभग 10 प्रतिशत वार्षिक है. इसमें कोई संदेह नहीं है कि कोचिंग उद्योग के कारण कोटा की अर्थव्यवस्था को एक नई गति मिली है और अखिल भारतीय स्तर पर अब शैक्षणिक नगरी के रूप में इसकी ख्याति स्थापित हो चुकी है. कोटा के कोचिंग उद्योग की बढ़ती हुई ख्याति से प्रभावित हो अमेरिका से श्री एरिक बेलमेन नें व्यक्तिगत रूप से 2008 में कोटा आ कर विशेष रूप से यहां की बंसल क्लासेज की कोचिंग प्रणाली का नजदीक से अध्ययन किया. उनकी विश्लेषणात्मक रिपोर्ट को India's Cram-School Confidential: Two Years, One Test, 40,000 Students Town Fills With Teens Studying Full-Time For a College Entrance Exam; 'Bansalites Rock' शीर्षक से अमेरिका के प्रमुख दैनिक समाचार पत्र “वाल स्ट्रीट जरनल” (30 09 2008) में प्रकाशित किया गया. इस रिपोर्ट में कोटा की अर्थव्यवस्था पर कोचिंग उद्योग के प्रभाव को निम्नलिखित शब्दों में व्यक्त किया गया है: Cramming has been the salvation of Kota, an industrial center in the 1970s that then fell on hard times. In the past three years, new malls, restaurants, hotels, Internet cafes and clothing stores began to spring up to serve the 16- and 17-year-old cram kids. Many homeowners have added second and third floors to rent out to students.

Balwan Diwani, manager of Milan Cycle, a bike shop in Kota, says bicycle sales have surged to more than 2,000 a year from fewer than 200 five years ago. Mamta Bansal, no relation to the school founder, quit her job as a maid to start a service to deliver boxed lunches and dinners to 30 students as they study. "We try to make what their mothers would cook for them," she says. "I have had to learn how to make dishes from Gujarat, the Punjab and southern India."

Local schools also have benefited: Cram students have to attend regular classes so they can pass their high-school exams and graduate. Some high schools have early morning classes so cram students can finish early and move on to cramming.

"There used to be a lot of hooliganism and goons," says Pradeep Singh Gour, director of the Lawrence and Mayo Public School in Kota. "Now the entire city is like a university campus."

कोचिंग की बढ़ती हुई ख्याति के कारण विगत कुछ वर्षों से कोटा को व्यावसायिक द्वेष से प्रेरित राजनैतिक पक्षपात का सामना करना पड़ रहा है. इस पक्षपात के प्रमुख उदाहरण हैं - कोटा के स्थान पर जोधपुर में आइ आइ टी (I.I.T.) की स्थापना करना और इंजीनियरिंग व मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं के केंद्र कोटा में नहीं रखना. यद्यपि इस वर्ष के बजट में यहां आइ आइ आइ टी (I.I.I.T.) की स्थापना की घोषणा की गई है, यह भविष्य के गर्भ में है क्योंकि पहले आइ आइ टी भी कोटा को देने की घोषणा की गई थी किंतु अंततोगत्वा इसे जोधपुर को दे दिया गया. इन नकारात्मक परिस्थितियों के बावजूद, कोटा की कोचिंग संस्थाओं की गुणवत्ता व यहां के कठोर प्रतिस्पर्धात्मक वातावरण के कारण छात्रों की संख्या में प्रति वर्ष वृद्धि हो रही है. गत वर्ष (सितंबर 2010) में, कोटा की एक अग्रणी कोचिंग संस्था कैरियर प्वाइंट (Career Point Infosystems Ltd.) नें इक्विटी शेयर्स की पब्लिक इश्यू के माध्यम से पूंजी बाजार में प्रवेश किया था जिसे निवेशकों का बहुत अच्छा समर्थन मिला. कहा जाता है कि शेयर बाज़ार का रुख आर्थिक स्वास्थ्य का सही संकेतक होता है. इस दृष्टि से इस पब्लिक इश्यू को मिला प्रोत्साहन कोटा की कोचिंग संस्थाओं के लिए और अंततः यहां की अर्थव्यस्था के अच्छे स्वास्थ्य का सूचक है.

इस लेख के आरंभ में पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के माध्यम से आर्थिक विकास का उल्लेख किया गया था. न केवल कोचिंग उद्योग में अपितु उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भी हम पाते हैं कि निजी क्षेत्र द्वारा कोटा में इंजीनियरिंग, डेंटल, मैनेजमेंट और सामान्य विषयों के महाविद्यालयों की स्थापना की जा चुकी है. इसी प्रकार, चिकित्सा के क्षेत्र में भी कॉरपोरेट हॉस्पिटल्स कार्य कर रहे हैं. निजी क्षेत्र में ही, मल्टी स्टोरी बिल्डिंग्स और टाउनशिप्स की संख्या में भी तेजी से वृद्धि हो रही है.

उक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि कोटा के आर्थिक विकास में (विशेष रूप से स्वतंत्रता के पश्चात) इसकी भौगोलिक स्थिति, जलवायु, प्राकृतिक संसाधनों, कृषि योग्य उपजाऊ भूमि, जल स्त्रोत खनिज संपदा का विशेष योगदान रहा है - चाहे वह 1950 का दशक हो या फिर 1960-70 के दशक या वर्तमान काल. इन सभी अनुकूल तत्वों के कारण कोटा के विकास की अपरिमित संभावनाएं हैं. किसी समय यह माना जाता था कि कोटा में उद्यमिता (entrepreneurship) की कमी है. किंतु यहां के संसाधनों से आकर्षित हो बाहर के उद्यमियों के आने, शिक्षा के विकास और स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के कारण स्थानीय उद्यमिता भी विकसित हुई है और कोटा के सतत विकास की संभावनाएं प्रबल हैं.